महिला दिवस की सभी को खूब बधाई मिली फेसबुक रहा हो या वाट्स एप सभी जगह महिला दिवस की बधाई की धूम मची हुई थी द्य हर इंसान देश की अधि आबादी का सम्मान करना चाह रहा था द्य दिल खुश था महिलाओं में भी ख़ुशी दिख रही थी द्य पर क्या वाकई में ऐसा हुआघ् दिल से सभी ने इस दिन को मनाया था क्या घ् क्या वाकई में आज की नारी इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार करती है की एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन लोग उनका सम्मान करेंगे घ् क्या इस देश को इस दिवस की वाकई में ज़रुरत हैघ् पूरी दुनिया में रविवार को एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था ए महिला सशक्तिकरण और उन्हें सम्मान देने की बात हो रही थी ए तो दूसरी ओर यूपी पुलिस का बर्बर चेहरा भी देखने को मिला द्य उन्नाव में शनिवार को एक सड़क हादसे के बाद विरोध.प्रदर्शन कर रही महिला को मौके पर पहुंचे पुलिस वालों ने लात.घूंसे से जमकर पीटा द्य रविवार को उन्नाव पुलिस अधीक्षक और गंगा घाट के थानाध्यक्ष को इस मामले में सस्पेंड कर दिया गया। वहींए दो पुलिसवालों को लाइन हाजिर किया गया है। इसके अलावा सड़क हादसे में मारे गए युवक के घरवालों को दो लाख रुपए मुआवजे का एलान किया गया है। दूसरी घटना है इलाहाबाद में हुई जहाँ एक युवती से रेप का प्रयास करने की घटना ने पूरे इंसानियत को शर्मसार कर दिया। बताया जा रहा है कि युवती जब शौच के लिए सुबह खेत में गईए इसी दौरान गांव के ही एक युवक ने इस वारदात को अंजाम देने की कोशिश की। फिलहाल पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। तीसरी खबर पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा लखनऊ में बनाये गए साइकिल ट्रैक पर महिलाओं ने साइकिल चलाई द्य और उन्हें आजादी का भरोसा दिलाया गया द्य साड़ी घटनाओं को देखने के बाद तो यही लगा की शायद उत्तर प्रदेश में इस दिवस का महत्व अन्य दिवसों से कुछ भी अलग नहीं द्य हर साल की तरह इस साल भी ये दिवस आया बड़ी बड़ी बातें हुई और कुछ नहीं द्य उन्नाव और इलाहाबाद की घटनाओं ने सरकार और प्रशासन पर तो सवाल खड़े ही किये हैं पर साथ ही हम पर भी ऊँगली उठी है द्य क्या वाकई में हम तैयार हैं देश की अधि आबादी को वो सम्मान और आजादी देने के लिए जिसके लिए वो न जाने कब से संघर्ष कर रही हैं घ् या देश की नारी अभी भी इस इंतज़ार में है कि हम उन्हें ये सब देंगे घ् चलिए दिवस आया और गया भी ए पर सवाल फिर वहीँ खड़ा है कि कब वह दिन आएगा जब हम आप को किसी विशेष दिन ये संकल्प लेने के लिए नहीं खड़ा होना होगाद्य
रविवार, 8 अप्रैल 2018
विरोध कितना सही
एक बार फिर हंगामा हुआ है। वजह है निर्भया कांड पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज डॉटर’। हंगामा क्यों है समझना भी ज़रुरी है। इसमें पहला सवाल है जो बहुत हद तक जायज लगता है वह यह कि क्या इसकी शूटिंग के दौरान जेल नियमों की अवहेलना हुई। डॉक्यूमेंट्री की ब्रिटिश निर्माता लेसली उडविन का दावा है कि उन्होंने 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीय युवती के साथ हुए दुराचार के सजायाफ्ता मुजरिम मुकेश सिंह से इंटरव्यू लेने के लिए तमाम प्रक्रियाएं पूरी की थीं। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो जांच होने के बाद ही पता चल सकेगी। इसके इतर एक सवाल जो और भी गंभीरता से उठाया जा रहा है कि क्या अपराधी को अपना पक्ष किसी फिल्म में या सार्वजनिक मंच पर रखने का मौका दिया जाना चाहिए। मुजरिम सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बातें कहता है, तो क्या उसे जनसंचार के माध्यमों पर प्रसारित किया जाना चाहिए? यह वो प्रश्न हैं जो फिलहाल पूरे देश में बहस का मुद्दा बने हुए हैं। हो सकता है कि कुछ लोग इसे गलत मानें और इस मामलें में तो यह विचार भी काम कर रहा है कि अपराधियों ने अकथनीय क्रूरता दिखाई, उन्हें मंच देना अवांछित और अनौचित्यपूर्ण है, मगर एक विचार यह भी है कि दुष्कर्म सामान्य अपराध नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐसी सांेच काम करती है, जिसकी जड़ें समाज में हैं। ऐसे में दुष्कर्म की मानसिकता को समझना ऐसे अपराधों को रोकने के उपाय करने के लिहाज से उपयोगी हो सकता है। मुकेश सिंह ने जो कहा बेशक उससे महिलाओं को लेकर उसकी पतित सोंच जाहिर होती है, और जिस तरह से इस पूरी डॉक्यूमेंट्री में वकीलों के बयान भी दिखाए गए। और उनका यह कहना कि हमारे समाज में लड़कियों का रात में किसी भी व्यक्ति के साथ बाहर जाना किसी भी तरह से सही नहीं है। यह बयान और भी कई सवालों को जन्म देता है। इस डॉक्यूमेंट्री में जो भी दिखाया गया है उसका विरोध कितना सही है यह तो आप जनता तय करे पर यह भी सच है कि इस डॉक्यूमेंट्री को नकारात्मक
सोंच के साथ नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुमकिन है कि यह डॉक्यूमेंट्री अपने समाज के एक अप्रिय यथार्थ से हमारा साक्षात्कार कराती है। भारत में इसे दिखाने पर रोक लगाई जा चुकी है। और अब मामला न्यायपालिका के दायरे में है। निर्भया कांड ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। आज भी इसकी चर्चा महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को उभार देती है। इसका विरोध दुखद है। अब उम्मीद न्यायालय से है कि उसका फैसला देश में एक मिसाल कायम करेगा।
एक्सप्रेस सी जिंदगी में रंगों का इंटरवल
जम्मू कश्मीर में बयान को लेकर विवाद है। भाई ये राजनीति है इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? अरविन्द केजरीवाल ने संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण से आप की अनबन है। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। विराट कोहली नाराज़ हैं उन्होंने पत्रकार भाई को अपशब्द कह दिए। इसमें भी बुरा मानने जैसा क्या है। ये देश तमान विसमताआंे से भरा हुआ है। यहां कई रंग हैं। कई भाषाएं हैं। तमाम विचारधाराएं यहां एक साथ आपस में हमेशा युद्ध लड़ती रहती हैं। पर इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? और वो भी ऐसे समय में जब त्यौहार ही बुरा न मानने का हो। होली का त्यौहार है जिसमें हमेशा ही हम बुरा न मानो होली है कहते हैं और वो सब कार्य करते हैं जो आम दिनों में किसी को भी बुरा महसूस करा सकते हैं। खैर इस त्यौहार में आइये हम सब मिल कर इन तमान बातों पर खुशी के रंग डालें और एक दुसरे से इस कदर मिलें कि देश की एकता और अखंडता को पूरी दुनिया में फिर से स्थापित करें। वैसे भी भारत हमेशा से ही तमाम विसमताओं को लेकर जिया है और जीता भी है। फिर वो धार्मिक विसमता हो, आर्थिक विसमता हो, वैचारिक विसमता हो, बोली की विसमता हो या क्षेत्र की विसमता हो। आइये फिर से एक हों और अबीर गुलाल के तमाम रंगों में रंग कर एक इंटरवल लें ताकि हमारी आपकी एक्सप्रेस की तरह भागती ज़िन्दगी में कुछ पल साथ के हों। पर ये ज़रुर ध्यान रहे कि किसी को कोई नुक्सान न हो, रंग हों, गुजिया हों, मीठा नमकीन हों, पर हेल्थ फ्रेंडली हों। देश हमारा है, लोग हमारे हैं, त्यौहार हमारा है रंग में भंग न पड़े तो अच्छा है। उन लोगों को भी नम आँखों से होली मुबारक जिन्होंने किसी भी कारण से अपने किसी को खो दिया हो। शहरवासियों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।
आप की लड़ाई
अन्ना आन्दोलन हुआ, कई बड़े लोग एक साथ आये। एक समूह तैयार हुआ। फिर फूट पड़ी और एक समूह दो भागों में बट गया। एक भाग अपने उसी उद्देश्य के साथ चल रहा था। दूसरा भाग जो कभी भी राजनीति में न आने की कसम खाए बैठे था वो राजनीति में आ गया। आम आदमी पार्टी बनाई और देश को गरीबी से मुक्ति तो नहीं पर कांग्रेस और भाजपा से मुक्ति दिलाने के लिए जनता के बीच में आ गए। खूब महनत हुई और शुरुआत दिल्ली चुनाव से की। चुनाव लड़े और अप्रत्याशित जीत भी दर्ज की। सरकार बनाई और अतिवादिता के चलते 49 दिन में ही सरकार गिरा भी दी। उतर पड़े लोक सभा चुनाव में और 4 सीट भी जीती। इसी बीच दिल्ली में सरकार न चलने के कारण पुरे देश में इसका विरोध भी झेला। दुबारा फिर दिल्ली में चुनाव हुए और इस बार और भी बेहतर प्रदर्शन कर सरकार बनायी। पर इस बार भी सरकार बनते ही फिर से पार्टी में विरोध उत्पन्न हो गया है। इस बार का विरोध कार्यकर्ता द्वारा नहीं बल्कि पार्टी को स्थापित करने वाले दो अहम लोगों का है। ये विरोध किसी और बात को लेकर भी नहीं, वही पुरानी बात कि पार्टी का मुखिया कौन ? पार्टी किसकी ? ये कोई पहली पार्टी नहीं है जिसमें इस बात को लेकर विरोध हुआ हो। इसी तरह का विरोध कांग्रेस भी झेल रही है और इसका हश्र भी वो देख चुकी है। हाल ही में बिहार में नितीश कुमार की पार्टी में कुछ ऐसा ही विरोध देखने को मिला था। जिसके चलते नितीश को भी काफी नुक्सान उठाना पड़ा। उत्तर प्रदेश में सपा पर भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं और इसका नुक्सान भी उसे कई बार झेलना पड़ा है। ऐसे में आप पार्टी में आया ये विरोध एक बहुत बड़े निराशा का संकेत देता है। अगर वाकई यह पार्टी आम जनता के लिए ही बनी है तो इसमें अलाकाम, परिवार वाद जैसे आरोपों का लगना बेहद ही दुखद है। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेता अगर पार्टी से हटाये जाते हैं या वो खुद पार्टी से त्यागपत्र देते हैं तो यह पार्टी के लिए जनता के बीच बहुत ही गलत सन्देश देगा। अरविन्द केजरीवाल को इस बात का ख्याल ज़रुर रखना चाहिए की फर्श से अर्श तक जितनी तेजी से आप पहुंची है अगर उसे गंभीरता से नहीं संभाला तो अर्श से फर्श तक आने में भी समय नहीं लगेगा।
क्या अब साफ होगी राजनीति
भारत देश में एक अजीब सोंच काम करती है कि जो जितना ज्यादा बाहुबली है, जो जितना ज्यादा ताकतवार और पैसे वाला है वही राजनीति में आ सकता है और जीत सकता है। ऐसी सोंच शायद इस लिए भी है क्योंकि इन प्रभावशाली लोगों से ही शायद जनता काम की उम्मीद करती है। पर ऐसा है नहीं। भारत देश में राजनीति में आप इन सब के बल पर दाखिल तो हो सकते हैं पर आप कभी राजनीति के उच्च पद पर बैठ नहीं सकते। जनता इतनी भी भोली नहीं। इधर कई वर्षों से यह देखने को मिला कि संसद हो या विधानसभा सभी जगह आपराधिक पृष्ठ के लोग जनता के प्रतिनिधि के रूप में प्रवेश कर रहे। अगर किसी के खिलाफ कोई मामला चल भी रहा है तो न्यायपालिका की लम्बी प्रक्रिया के चलते उसका कोई नुक्सान नहीं होता। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति को स्वच्छ बनाने की अनेक पहल की है। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अब उसने हर हाईकोर्ट में एक विशेष बेंच बनाने का निर्देश दिया है, ताकि चुनाव याचिकाओं का जल्द-से-जल्द निपटारा हो। छत्तीसगढ़ में पराजित उम्मीदवार की याचिका पर निर्णय देते हुए जस्टिस जे. चेलामेश्वर और जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन की खंडपीठ ने कहा कि कोई सांसद या विधायक अवैध साधनों का इस्तेमाल करते हुए निर्वाचित हुआ हो, तो उसे एक दिन भी अपने पद पर नहीं रहना चाहिए। किंतु ऐसा बहुत कम होता है, जब निर्वाचित प्रत्याशियों के खिलाफ दायर चुनाव अर्जियों का निपटारा उनके कार्यकाल में हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में दो अहम बातें स्वीकार कीं। पहली यह कि इस देर से न्यायिक प्रक्रिया का मखौल उड़ता है और दूसरे यह कि इससे न्यायपालिका की आलोचना की वजह मिलती है, जिससे उसकी साख प्रभावित होती है। अब न्यायपालिका ने अपनी और विधायिका दोनों कि साख को सुरक्षित करने का प्रयास किया है। खंडपीठ का यह सुझाव भी स्वागतयोग्य है कि उच्च न्यायालयों में प्रस्तावित विशेष पीठ में शामिल न्यायाधीशों पर चुनाव अर्जी की सुनवाई पूरी होने तक दूसरे कामकाज का बोझ न डाला जाए। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों ने अगर तत्परता से इन निर्देशों पर अमल किया तो देश एक बड़ी न्यायिक विसंगति से बच जाएगा। देश की राजनीति और न्यायपालिका के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय बेहद ही सराहनीय है। और शायद भारत देश की जनता इस निर्णय के चलते एक बेहतर राजनीति का स्वरुप देख सकेगी। इसका ध्यान ज़रुर रहे कि इस सपने को पूरा करने में आम जनता की भी भागीदारी है।
साहित्य का अस्तित्व
हिन्दुस्तान को साहित्य का देश कहा जाता है। शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां साहित्य को पसंद करने वाले लोग न हों। ऐसे में यही माना जाता है कि देश का साहित्य में भविष्य बहुत ही उज्जवल है। पर क्या ऐसा सही में है? क्या वाकई में साहित्य का जो स्तर रहा है भारत में अब भी वही है? शायद नहीं। हाल ही के कुछ वर्षों में साहित्य की लेखनी और उसकी पसंद में काफी हद तक बदलाव आ गया है। इसकी वजह भी है। जब देश में हिंदी भाषा को ही कई बार खतरे में ला कर रख दिया गया हो वहां हिन्दी साहित्य को कौन पढ़ना चाहेगा। जहां स्कूलों और विश्वविद्यालयों में ही हिन्दी की पढ़ाई को मात्र औपचारिकता माना जाता हो वहां साहित्य का स्तर क्या होगा ये भी समझाने की ज़रुरत नहीं। इधर बीच कई साहित्य सम्मेलनों और कवि सम्मेलनों में जाना हुआ। जहां अमूमन हर कवि, शायर, साहित्यकार यही कहता नज़र आया कि देश में साहित्य का स्तर काफी गिरता जा रहा है। जिसमें खास तौर से हिंदी और उर्दू का साहित्य है। इसकी वजह को तलाशने कि कोशिश की तो पता चला अब भारत में युवा पढ़ने में दिलचस्पी नहीं लेते। दूसरा कि नेट क्रांति के चलते अब लोग ऑनलाइन ही पढ़ना पसंद करते हैं। ऐसे में हिंदी साहित्य ऑनलाइन उपलब्ध कम हो सका है। तीसरी सबसे बड़ी वजह साहित्य का बाजारवाद में शामिल होना। इसको लेकर तमाम बार बहस भी हो चुकी है और साहित्य क्षेत्र के लोगों ने भी इसपर घोर आपत्ति जताई है। उनके अनुसार अब साहित्य पढ़ने के लिए नहीं बल्कि बेचने के लिए लिखा जाता है। और साहित्य का बेचना भी एक प्रबंधन का रूप ले चूका है। इन परिस्थितियों को देखने के बाद तो यही लगता है कि अगर अब भी साहित्य को पैसे की जगह शाब्दिक और वैचारिक रूप से अमीर नहीं बनाया गया तो साहित्य भी इतिहास में गिना जाएगा। इसके लिए साहित्यकार, पाठक के साथ साथ सरकारें भी ज़िम्मेदार हैं जो साहित्य जगत की बढ़ोत्तरी के लिए सिर्फ औपचारिकता न पूरी करे बल्कि साहित्य जैसे गंभीर विषयों पर ठोस कदम उठाये। साहित्य विचोरों का संग्रह है और अगर विचार ही खत्म हो गए तो देश के सतत विकास का सपना सिर्फ सपना मात्र ही रह जाएगा।
बोझ उतना जितना बर्दास्त हो
2022 तक खत्म होगी गरीबी। संसद में जब आम बजट पेश करते वक्त वित्त मंत्री अरुण जेठली ने यह घोषणा की तो सभी विपक्ष की नींद ही उड़ गई। पक्ष ने खूब तालियां बजा कर इसका स्वागत किया। बेहतर है की आम बजट में गरीबी खत्म करने की बात की गई है। पिछले साठ साल से हम यही सुनते आये हैं हर बजट में कि गरीबी कम की जाएगी। पर अगर अब हम गरीबी खत्म करने की बात कर रहे तो शायद कुछ बेहतर ही है। परन्तु इस पर कई सवाल भी हैं कि आखिर यह होगा कैसे ? सिर्फ सदन में इतना कह देने भर से गरीबी खत्म नहीं होती। अगर ऐसे में विपक्ष यह कहता है कि ये सिर्फ काल्पनिक बजट है तो शायद गलत नहीं है। वित्त मंत्री जी आखिर बातें करके आप जनता को यह तो बताना चाहते हैं कि बीजेपी सिर्फ गरीबों और आम जनता के लिए काम कर रही है। पर उसकी एक ठोस रूपरेखा नहीं बताई आप ने। ये कहना भी गलत नहीं है कि बीजेपी ने इस बार के आम बजट में परंपरागत बजट पेश करने की औपचारिकता मात्र नहीं की है। लेकिन ऐसा कहना की वाकई में ये बजट पूरी तरह से आम जनता का है तो भी गलत ही होगा। मोबाइल फोन, पानी की बोतल, रेस्टोरेंट में खाना, दवाइयां जैसी चीजें महंगी होना। टैक्स में कोई रियायत न मिलने से आम जनता में निराशा है। इसके साथ ही सर्विस टैक्स में बढोतरी, 2 प्रतिशत स्वच्छ भारत टैक्स ने भी जनता पर बोझ बढ़ा दिया है। विपक्ष इन्ही मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का मन बना रही है। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से देश में सफाई और विकास पर जोर देते हुए हर योजनाएं बनाने की बात की थी ऐसे में इस तरह का आम बजट कहीं न कहीं उनकी बातों को पूरा करता तो दिखता है पर जनता पर इतना बोझ कही आप को आने वाले चुनावों में भारी न पड़ जाए। मोदी जी बीजेपी की सरकार पहली बार पूर्ण बहुमत से बनी है। इस बात का जरुर ख्याल रखें कि भारत की जनता अभी इतना बोझ सहने के लिए तैयार नहीं है।
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