भारतीय राजनीति में उसे बहुत पसंद किया जाता है जो बेहतर वक्ता होता है। जो हाजिर जवाबी होता है। जिसे हर सवाल का बेहतर तरीके से जवाब देना आता है। फिर वो चाहे सदन में पूंछा गया हो या मीडिया द्वारा। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री को राजनीति में कच्चा खिलाडी माना जाता रहा है। लेकिन कुछ महीनों में देखें तो अखिलेश यादव जिस तरह से सदन में जवाब देते दिखते हैं। मीडिया को जवाब देते दिखते हैं वो कहीं न कहीं राजनीति के अच्छे लक्षण ही जान पड़ते हैं। मंगलवार को सदन में अखिलेश यादव ने राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा जो कि सर्वसम्महति से पास हो गया। इस बीच सीएम ने विपक्षियों की जमकर चुटकी भी ली। सीएम सदन में आए और अपना धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा। उन्होंने अपने हाजिर जवाबी से यह भी साबित कर दिया कि वे पक्के राजनीतिक व्यक्ति बन गए हैं। मंगलवार को सदन में सीएम अखिलेश ने सरकार की योजनाओं का जमकर बखान किया और बीच-बीच में विपक्षियों पर हमले भी किए। बातों-बातों में ही सीएम ने नेता प्रतिपक्ष को सपा में शामिल होने का न्योता भी दे दिया। धन्यवाद प्रस्ताव के शुरुआत में ही सीम अखिलेश ने चुटकी लेते हुए कहा कि सुना है नेता प्रतिपक्ष कह रहे हैं कि सपा सरकार की योजनाएं झुनझुना है। वहीं, एक दल कहता है कि ये योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही लागू हंै। सीएम ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष सपा सरकार के झुनझुने की तारीफ कर चुके हैं। सीएम ने स्वामी प्रसाद मौर्या पर चुटकी लेते हुए कहा कि जब एक्सप्रेस-वे बन जाएगा तब आपको साथ घुमाने जरूर ले जाएंगे। सीएम अखिलेश यादव ने मायावती पर निशाना साधते हुए कहा कि जो हाथी पुरानी सरकार ने बनवाए थे, वह खड़े ही रह गए हैं। सदन में अखिलेश यादव ने कहा कि एक दल कह रहा था कि 24 घंटे बिजली देंगे, लेकिन यह नहीं बताया कि 24 घंटे बिजली देंगे कैसे? सीएम ने कहा कि 24 घंटे बिजली आपूर्ति के लिए सपा सरकार लगातार काम कर रही है। अखिलेश यादव के इस तरह का बयान दिया जाना उनका राजनीति के लिए परिपक्व होना दर्शाता है। पर इस बात का ध्यान रखना होगा की आप अपनी वाक्पटुता से भले ही राजनीति के लिए तैयार हो गए हैं पर अब जनता बातों से मानने वाली नहीं है। काम करके दिखाइए जनता आपका साथ देगी। वरना विकल्प हमेशा ही जनता के हाँथ में रहता है।
रविवार, 8 अप्रैल 2018
विरोध कितना सही
अक्सर आप पर सवाल उठे हैं। आप की एकता से सभी डरते भी हैं। इसकी मिसाल भी देते हैं। अच्छी बात है की आप में इतनी एकता है। कहा भी जाता है कि एकता में ही शक्ति है। पर क्या यह शक्ति आप की सही दिशा में लग रही है ? क्या वाकई में आप इस शक्ति के माध्यम से देश में एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में आप के द्वारा तमाम प्रकार के विरोध प्रदर्शन किये गए। जिसका खामियाजा उस इंसान ने भरा हो या नहीं जिसका आप विरोध कर रहे थे। पर आम जनता को उसने काफी हद तक बेहाल कर दिया। किसी की जान गई और किसी ने पहली सांस भी उसी जाम में ली। इस बार फिर से आप विरोध कर रहे। तहसील का ट्रान्सफर होना सही है या नहीं ये तो वही बता सकता है जिसका उससे अक्सर वास्ता पड़ता रहता है। ये भी सही है कि उसकी दूरी आप को भी खल रही है। पर जिस तरह का आप का विरोध है। जरा सोंचिये की इसकी वजह से न्यायालय में आने वाले फरियादियों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। आप की मांगे जायज़ हो सकती हैं पर उसका विरोध सीधे आम जनता को कष्ट दे कर हो कहां तक सही है ये। आप खुद तय करें। पुलिस द्वारा आप पर हुए लाठीचार्ज को कोई भी सही नहीं मानता पर क्यों नहीं ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे आप के बुद्धजीवी होने के पद पर सवाल न खड़ा किया जाए। जिस तरह से आप की छवि पर उंगलियां उठने लगी हैं। ये आज तो नहीं पर आने वाली आप की ही नई पौध के लिए कितनी घातक साबित होगी इसका अनुमान आप खुद हि लगा सकते हैं। ऐसा न हो कि लोग अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए आप का साथ लेने से भी कतराने लगें। इसके लिए बेहतर होगा कि समय रहते ही आप गंभीरता से इस पर विचार करें और अपने विरोध के तरीके को थोडा सा बदलें ताकि आप की मांगें भी पूरी हो सकें और आम जनता को भी कोई दिक्कत न हो।
एक दिन ही क्यों
महिला दिवस की सभी को खूब बधाई मिली फेसबुक रहा हो या वाट्स एप सभी जगह महिला दिवस की बधाई की धूम मची हुई थी द्य हर इंसान देश की अधि आबादी का सम्मान करना चाह रहा था द्य दिल खुश था महिलाओं में भी ख़ुशी दिख रही थी द्य पर क्या वाकई में ऐसा हुआघ् दिल से सभी ने इस दिन को मनाया था क्या घ् क्या वाकई में आज की नारी इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार करती है की एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन लोग उनका सम्मान करेंगे घ् क्या इस देश को इस दिवस की वाकई में ज़रुरत हैघ् पूरी दुनिया में रविवार को एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था ए महिला सशक्तिकरण और उन्हें सम्मान देने की बात हो रही थी ए तो दूसरी ओर यूपी पुलिस का बर्बर चेहरा भी देखने को मिला द्य उन्नाव में शनिवार को एक सड़क हादसे के बाद विरोध.प्रदर्शन कर रही महिला को मौके पर पहुंचे पुलिस वालों ने लात.घूंसे से जमकर पीटा द्य रविवार को उन्नाव पुलिस अधीक्षक और गंगा घाट के थानाध्यक्ष को इस मामले में सस्पेंड कर दिया गया। वहींए दो पुलिसवालों को लाइन हाजिर किया गया है। इसके अलावा सड़क हादसे में मारे गए युवक के घरवालों को दो लाख रुपए मुआवजे का एलान किया गया है। दूसरी घटना है इलाहाबाद में हुई जहाँ एक युवती से रेप का प्रयास करने की घटना ने पूरे इंसानियत को शर्मसार कर दिया। बताया जा रहा है कि युवती जब शौच के लिए सुबह खेत में गईए इसी दौरान गांव के ही एक युवक ने इस वारदात को अंजाम देने की कोशिश की। फिलहाल पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। तीसरी खबर पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा लखनऊ में बनाये गए साइकिल ट्रैक पर महिलाओं ने साइकिल चलाई द्य और उन्हें आजादी का भरोसा दिलाया गया द्य साड़ी घटनाओं को देखने के बाद तो यही लगा की शायद उत्तर प्रदेश में इस दिवस का महत्व अन्य दिवसों से कुछ भी अलग नहीं द्य हर साल की तरह इस साल भी ये दिवस आया बड़ी बड़ी बातें हुई और कुछ नहीं द्य उन्नाव और इलाहाबाद की घटनाओं ने सरकार और प्रशासन पर तो सवाल खड़े ही किये हैं पर साथ ही हम पर भी ऊँगली उठी है द्य क्या वाकई में हम तैयार हैं देश की अधि आबादी को वो सम्मान और आजादी देने के लिए जिसके लिए वो न जाने कब से संघर्ष कर रही हैं घ् या देश की नारी अभी भी इस इंतज़ार में है कि हम उन्हें ये सब देंगे घ् चलिए दिवस आया और गया भी ए पर सवाल फिर वहीँ खड़ा है कि कब वह दिन आएगा जब हम आप को किसी विशेष दिन ये संकल्प लेने के लिए नहीं खड़ा होना होगाद्य
विरोध कितना सही
एक बार फिर हंगामा हुआ है। वजह है निर्भया कांड पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज डॉटर’। हंगामा क्यों है समझना भी ज़रुरी है। इसमें पहला सवाल है जो बहुत हद तक जायज लगता है वह यह कि क्या इसकी शूटिंग के दौरान जेल नियमों की अवहेलना हुई। डॉक्यूमेंट्री की ब्रिटिश निर्माता लेसली उडविन का दावा है कि उन्होंने 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीय युवती के साथ हुए दुराचार के सजायाफ्ता मुजरिम मुकेश सिंह से इंटरव्यू लेने के लिए तमाम प्रक्रियाएं पूरी की थीं। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो जांच होने के बाद ही पता चल सकेगी। इसके इतर एक सवाल जो और भी गंभीरता से उठाया जा रहा है कि क्या अपराधी को अपना पक्ष किसी फिल्म में या सार्वजनिक मंच पर रखने का मौका दिया जाना चाहिए। मुजरिम सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बातें कहता है, तो क्या उसे जनसंचार के माध्यमों पर प्रसारित किया जाना चाहिए? यह वो प्रश्न हैं जो फिलहाल पूरे देश में बहस का मुद्दा बने हुए हैं। हो सकता है कि कुछ लोग इसे गलत मानें और इस मामलें में तो यह विचार भी काम कर रहा है कि अपराधियों ने अकथनीय क्रूरता दिखाई, उन्हें मंच देना अवांछित और अनौचित्यपूर्ण है, मगर एक विचार यह भी है कि दुष्कर्म सामान्य अपराध नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐसी सांेच काम करती है, जिसकी जड़ें समाज में हैं। ऐसे में दुष्कर्म की मानसिकता को समझना ऐसे अपराधों को रोकने के उपाय करने के लिहाज से उपयोगी हो सकता है। मुकेश सिंह ने जो कहा बेशक उससे महिलाओं को लेकर उसकी पतित सोंच जाहिर होती है, और जिस तरह से इस पूरी डॉक्यूमेंट्री में वकीलों के बयान भी दिखाए गए। और उनका यह कहना कि हमारे समाज में लड़कियों का रात में किसी भी व्यक्ति के साथ बाहर जाना किसी भी तरह से सही नहीं है। यह बयान और भी कई सवालों को जन्म देता है। इस डॉक्यूमेंट्री में जो भी दिखाया गया है उसका विरोध कितना सही है यह तो आप जनता तय करे पर यह भी सच है कि इस डॉक्यूमेंट्री को नकारात्मक
सोंच के साथ नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुमकिन है कि यह डॉक्यूमेंट्री अपने समाज के एक अप्रिय यथार्थ से हमारा साक्षात्कार कराती है। भारत में इसे दिखाने पर रोक लगाई जा चुकी है। और अब मामला न्यायपालिका के दायरे में है। निर्भया कांड ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। आज भी इसकी चर्चा महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को उभार देती है। इसका विरोध दुखद है। अब उम्मीद न्यायालय से है कि उसका फैसला देश में एक मिसाल कायम करेगा।
एक्सप्रेस सी जिंदगी में रंगों का इंटरवल
जम्मू कश्मीर में बयान को लेकर विवाद है। भाई ये राजनीति है इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? अरविन्द केजरीवाल ने संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण से आप की अनबन है। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। विराट कोहली नाराज़ हैं उन्होंने पत्रकार भाई को अपशब्द कह दिए। इसमें भी बुरा मानने जैसा क्या है। ये देश तमान विसमताआंे से भरा हुआ है। यहां कई रंग हैं। कई भाषाएं हैं। तमाम विचारधाराएं यहां एक साथ आपस में हमेशा युद्ध लड़ती रहती हैं। पर इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? और वो भी ऐसे समय में जब त्यौहार ही बुरा न मानने का हो। होली का त्यौहार है जिसमें हमेशा ही हम बुरा न मानो होली है कहते हैं और वो सब कार्य करते हैं जो आम दिनों में किसी को भी बुरा महसूस करा सकते हैं। खैर इस त्यौहार में आइये हम सब मिल कर इन तमान बातों पर खुशी के रंग डालें और एक दुसरे से इस कदर मिलें कि देश की एकता और अखंडता को पूरी दुनिया में फिर से स्थापित करें। वैसे भी भारत हमेशा से ही तमाम विसमताओं को लेकर जिया है और जीता भी है। फिर वो धार्मिक विसमता हो, आर्थिक विसमता हो, वैचारिक विसमता हो, बोली की विसमता हो या क्षेत्र की विसमता हो। आइये फिर से एक हों और अबीर गुलाल के तमाम रंगों में रंग कर एक इंटरवल लें ताकि हमारी आपकी एक्सप्रेस की तरह भागती ज़िन्दगी में कुछ पल साथ के हों। पर ये ज़रुर ध्यान रहे कि किसी को कोई नुक्सान न हो, रंग हों, गुजिया हों, मीठा नमकीन हों, पर हेल्थ फ्रेंडली हों। देश हमारा है, लोग हमारे हैं, त्यौहार हमारा है रंग में भंग न पड़े तो अच्छा है। उन लोगों को भी नम आँखों से होली मुबारक जिन्होंने किसी भी कारण से अपने किसी को खो दिया हो। शहरवासियों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।
आप की लड़ाई
अन्ना आन्दोलन हुआ, कई बड़े लोग एक साथ आये। एक समूह तैयार हुआ। फिर फूट पड़ी और एक समूह दो भागों में बट गया। एक भाग अपने उसी उद्देश्य के साथ चल रहा था। दूसरा भाग जो कभी भी राजनीति में न आने की कसम खाए बैठे था वो राजनीति में आ गया। आम आदमी पार्टी बनाई और देश को गरीबी से मुक्ति तो नहीं पर कांग्रेस और भाजपा से मुक्ति दिलाने के लिए जनता के बीच में आ गए। खूब महनत हुई और शुरुआत दिल्ली चुनाव से की। चुनाव लड़े और अप्रत्याशित जीत भी दर्ज की। सरकार बनाई और अतिवादिता के चलते 49 दिन में ही सरकार गिरा भी दी। उतर पड़े लोक सभा चुनाव में और 4 सीट भी जीती। इसी बीच दिल्ली में सरकार न चलने के कारण पुरे देश में इसका विरोध भी झेला। दुबारा फिर दिल्ली में चुनाव हुए और इस बार और भी बेहतर प्रदर्शन कर सरकार बनायी। पर इस बार भी सरकार बनते ही फिर से पार्टी में विरोध उत्पन्न हो गया है। इस बार का विरोध कार्यकर्ता द्वारा नहीं बल्कि पार्टी को स्थापित करने वाले दो अहम लोगों का है। ये विरोध किसी और बात को लेकर भी नहीं, वही पुरानी बात कि पार्टी का मुखिया कौन ? पार्टी किसकी ? ये कोई पहली पार्टी नहीं है जिसमें इस बात को लेकर विरोध हुआ हो। इसी तरह का विरोध कांग्रेस भी झेल रही है और इसका हश्र भी वो देख चुकी है। हाल ही में बिहार में नितीश कुमार की पार्टी में कुछ ऐसा ही विरोध देखने को मिला था। जिसके चलते नितीश को भी काफी नुक्सान उठाना पड़ा। उत्तर प्रदेश में सपा पर भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं और इसका नुक्सान भी उसे कई बार झेलना पड़ा है। ऐसे में आप पार्टी में आया ये विरोध एक बहुत बड़े निराशा का संकेत देता है। अगर वाकई यह पार्टी आम जनता के लिए ही बनी है तो इसमें अलाकाम, परिवार वाद जैसे आरोपों का लगना बेहद ही दुखद है। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेता अगर पार्टी से हटाये जाते हैं या वो खुद पार्टी से त्यागपत्र देते हैं तो यह पार्टी के लिए जनता के बीच बहुत ही गलत सन्देश देगा। अरविन्द केजरीवाल को इस बात का ख्याल ज़रुर रखना चाहिए की फर्श से अर्श तक जितनी तेजी से आप पहुंची है अगर उसे गंभीरता से नहीं संभाला तो अर्श से फर्श तक आने में भी समय नहीं लगेगा।
क्या अब साफ होगी राजनीति
भारत देश में एक अजीब सोंच काम करती है कि जो जितना ज्यादा बाहुबली है, जो जितना ज्यादा ताकतवार और पैसे वाला है वही राजनीति में आ सकता है और जीत सकता है। ऐसी सोंच शायद इस लिए भी है क्योंकि इन प्रभावशाली लोगों से ही शायद जनता काम की उम्मीद करती है। पर ऐसा है नहीं। भारत देश में राजनीति में आप इन सब के बल पर दाखिल तो हो सकते हैं पर आप कभी राजनीति के उच्च पद पर बैठ नहीं सकते। जनता इतनी भी भोली नहीं। इधर कई वर्षों से यह देखने को मिला कि संसद हो या विधानसभा सभी जगह आपराधिक पृष्ठ के लोग जनता के प्रतिनिधि के रूप में प्रवेश कर रहे। अगर किसी के खिलाफ कोई मामला चल भी रहा है तो न्यायपालिका की लम्बी प्रक्रिया के चलते उसका कोई नुक्सान नहीं होता। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति को स्वच्छ बनाने की अनेक पहल की है। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अब उसने हर हाईकोर्ट में एक विशेष बेंच बनाने का निर्देश दिया है, ताकि चुनाव याचिकाओं का जल्द-से-जल्द निपटारा हो। छत्तीसगढ़ में पराजित उम्मीदवार की याचिका पर निर्णय देते हुए जस्टिस जे. चेलामेश्वर और जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन की खंडपीठ ने कहा कि कोई सांसद या विधायक अवैध साधनों का इस्तेमाल करते हुए निर्वाचित हुआ हो, तो उसे एक दिन भी अपने पद पर नहीं रहना चाहिए। किंतु ऐसा बहुत कम होता है, जब निर्वाचित प्रत्याशियों के खिलाफ दायर चुनाव अर्जियों का निपटारा उनके कार्यकाल में हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में दो अहम बातें स्वीकार कीं। पहली यह कि इस देर से न्यायिक प्रक्रिया का मखौल उड़ता है और दूसरे यह कि इससे न्यायपालिका की आलोचना की वजह मिलती है, जिससे उसकी साख प्रभावित होती है। अब न्यायपालिका ने अपनी और विधायिका दोनों कि साख को सुरक्षित करने का प्रयास किया है। खंडपीठ का यह सुझाव भी स्वागतयोग्य है कि उच्च न्यायालयों में प्रस्तावित विशेष पीठ में शामिल न्यायाधीशों पर चुनाव अर्जी की सुनवाई पूरी होने तक दूसरे कामकाज का बोझ न डाला जाए। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों ने अगर तत्परता से इन निर्देशों पर अमल किया तो देश एक बड़ी न्यायिक विसंगति से बच जाएगा। देश की राजनीति और न्यायपालिका के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय बेहद ही सराहनीय है। और शायद भारत देश की जनता इस निर्णय के चलते एक बेहतर राजनीति का स्वरुप देख सकेगी। इसका ध्यान ज़रुर रहे कि इस सपने को पूरा करने में आम जनता की भी भागीदारी है।
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