मंगलवार, 12 जून 2018

फ़िल्म आईना है उसे नही समाज को साफ करें

क्या होता है जब घर पे माँ पिता के बीच संबंध अच्छे नही होते लेकिन वो अपने बच्चों से उसे छुपाते हैं मगर बच्चे सब जानते हैं और एक मुद्दत से वो मां पिता के प्रेम को तरसते हैं और जब वो बच्चा कोई लड़की हो तो भावुकता की बात ज्यादा होती है। वो लड़की किसी से प्यार करती है और जब उसके साथ रहने के लिए वो लड़का शादी की बात करता है तब वो लड़की इस लिए घबरा जाती है क्योंकि बचपन से उसने पति पत्नी के रूप में जो संबंध देखा है वो उसके लिए बहुत ही तकलीफ देय है वो परिवार के आपसी ताने बाने को समझने में असमर्थ है और इस लिए उसके अंदर एक भय बना हुआ है कि कहीं बाद में जो आज सब खूबसूरत रिश्ते दिख रहे वो बदल न जाएं और इनके अंदर की खूबसूरती और प्रेम खत्म न हो जाये और संबंध न खत्म हो जाये। क्या होता है जब एक लड़की जो रोज़ पति पत्नी के झगड़े और टूटते संबंधों को देखती है क्योंकि वो एक लॉयर है। उसके अंदर एक भय होता है कि वो जिस लड़के से शादी करेगी कहीं वो भी ऐसा तो नही होगा। और वो भी तब जब उसके बचपन के प्यार जिसके लिए वो अपना शहर तक छोड़ के गई हो वो उसे धोखा दे चुका है। इधर मां की एक ही ख्वाहिश है कि वो बस शादी कर के। ये सब बातें वो बोल नही पा रही। एक लड़की जिसे सम्मान देने वाला और प्यार करने वाला एक लड़का जिससे वो शादी कर लेती है लेकिन घर भर की दुश्मन हो जाती क्योंकि वो लड़का उसकी जात का तो दूर उसके देश का भी नही है जबकि वो लड़का शायद उसके लिए सबसे बेहतर है और वो हर पल इस दर्द को अपने अंदर समाए जी रही है और कह नही पा रही। क्या होता है जब एक लड़का जिससे एक लड़की बहुत प्यार करती है उससे शादी करती है लेकिन लड़का उसके हर एक एक चीज़ पे उसे टोकता रहता है कपड़े ऐसे पहने ये क्यों करती हो ये क्यों नही करती। काम करो या नही खाने में क्या बनाओ क्या नही हर एक चीज़ पे और जिसके चलते उनका व्यक्तिगत जीवन पूरी तरह से प्रेम विहीन हो जाता है। और इसकी कमी उस लड़की के अंदर उसे तकलीफ देती है और किसी अन्य मर्द के साथ न सो कर हस्थमैथुन कर लेती है तो उसका पति उसे चरित्रहीन की श्रेणी में रख देता है। ये बात वो किसी से नही कहती और पूरा समाज उसका चरित्र प्रमाणपत्र देने लगता है।
ये सब कुछ इस लिए होता है क्योंकि इन सब उलझी ज़िन्दगी के बीच वो चारों लड़कियां खुश रहती हैं अपनी ज़िंदगी को खुल के जीने की पुरी कोशिश करती हैं। शायद इस लिए उन्हें गलत और गंदी लड़कियां कहा गया है।
मगर जरा एक और पहलू देखिए क्या किसी लड़की ने किसी को धोखा दिया। क्या वो किसी का अपमान कर और किसी का इस्तेमाल कर उसे छोड़ देने की इक्षा रखती है। वो बस किसी संबंध को खोना नही चाहती और न यह साबित करना चाहती हैं कि वो संबंधों या व्यक्तियों को वस्तु समझती हैं।
खूबसूरती किसी भी रिश्ते की यह होती है कि वो अपनों से सच बोलती हैं अपने माँ पिता से कुछ नही छुपाती।
एक पहलू और कि वो चारों बेहद ही करीबी दोस्त हैं एक दूसरे में सबकी जान बस्ती है। लेकिन फिर भी अपने जीवन की बहुत सी बातें जो उन्हें तकलीफ देती हैं वो उन्हें भी नही बताती। विचार आपस में मिलते हैं या नही मिलते मगर साथ वो एक दूसरे का नही छोड़ना चाहती।
एक और पहलू कि इन सब जीवन की जद्दो जहद के बीच वो तमाम गलतियां भी करती हैं। जिनके लिए उनको खुद ही उन गलतियों का एहसास होता है और उनकी पुनरावृति से वो हमेशा ही बचती आई हैं और उनकी सज़ा भी वो खुद को देती हैं।
इन सब के साथ कुछ ऐसे भी पहलू हैं जिनके लिए उन्हें हम और आप गलत कह सकते हैं और गलत कहना सही भी है मसलन भाषा शैली के लिए उनके खानपान के लिए उनकी जिद के लिए। परंतु प्रश्न यह है कि शायद असल जिंदगी में वर्तमान समाज यही तो कर रहा है। और अगर उसे सामने लाने के लिए कोई फ़िल्म उसे वैसा का वैसा ही दिखा दे रहा तो उसमें फ़िल्म बनाने वाले का कोई दोष नही बल्कि यह हमें सोचना है कि आखिर हमने कौन सा समाज बना रखा है जो आज ऐसी फिल्में बनानी पड़ रही। क्यों जो कृत्य पुरुषों के हमेशा से असामाजिक
कहे जाते थे आज महिलाओं को भी वही करने की आदत हो चुकी है और उसे पुरुष स्वीकारना नही चाह रहा और महिलाएं उसे समानता समझने लगी हैं। विरोध फ़िल्म का या उनके किरदारों न करिए बल्कि जो उसमें दिखाया गया है कि ये समाज में हो रहा उसे सुधारने और खुद से बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रेम को जाति में न बांधे बस यह देखें कि हमारे बच्चे खुश किसमें हैं। लड़कों को चाहिए कि वो लड़कियों के खामोश दर्द को समझें। लड़कियों को भी लड़कों की खामोशी समझनी होगी।
बागबान फ़िल्म में जब लड़की देर रात क्लब जाती है और इससे उसके घर वालों को कोई फर्क नही पड़ता लेकिन जिस लड़के के साथ वो जाती है वो उसकी इक्षा के विरुद्ध उससे संबंध बनाना चाहता है (नशे की हालत में) और लड़की उसका विरोध करती है। तब लड़का गलत होता है ठीक उसी प्रकार से वीरे दी वेडिंग में जब लड़की लड़के को कार्यक्रम के बीच में उसकी इक्षा के विरुद्ध किस करना चाहती है तो यहां पर लड़का गलत नही बल्कि गलती लड़की की है और यह बात कहना कि जाओ तुम मम्मा बॉय हो तुम उन्ही से शादी कर लो किसी भी नज़र से सही नही कहा जा सकता। जिस प्रकार से आप की इक्षाएँ होती हैं ठीक उसी प्रकार से लड़कों की भी मर्ज़ी और उनकी इक्षा का खयाल आप को रखना होगा। इसी फिल्म में जिस प्रकार से करीना कपूर से शादी करने वाला लड़का उसका उसके हर फैसले में साथ देता है वैसे ही एक अंग्रेज लड़के के हर फैसले पे लड़की उसका साथ देती है।
फ़िल्म में यह समझाया गया है कि हर इंसान गलती करता है परंतु उसे गलती सुधारने और बदलाव करने का मौका दिया जाए तो निश्चित ही परिणाम सकारात्मक होगा। बस हमें उनपर पूर्ण भरोसा करना होगा।
फ़िल्म में आप को लगता होगा कि प्रेम का मतलब सिर्फ सेक्स बताया गया है परंतु ऐसा नही है। यह समाज में हो रहा ऐसा दर्शाया गया है। प्रेम में समझ, सम्मान, आदर, भरोसा, संचार और खुशी का होना ज़रूरी है। फिर वो रिश्ता कोई भी हो चाहे भाई भाई का ही क्यों न हो या फिर प्रेमी प्रेमिका का हो।
यह ज़रूर है कि हमें प्रेम को भोग विलास ही नही समझना चाहिए वो ज़रूरत मात्र है और यह ज़रूरत तभी पूरी हो सकती है जब उपरोक्त प्रेम के आवश्यक तत्वों को पूरा किया जाएगा। त्याग की भावना और सामने वाले को सदैव ऊपर उठाने का प्रयास ही रिश्ता मज़बूत करता है।
भाषाशैली पे मेरी आपत्ति है। और समाज को यही बदलाव करना होगा। फिल्में समाज का आईना होती हैं यदि वह आईना आप को गंदा लग रहा तो समाज को खुद को साफ करना होगा वरना आईना है रगड़ते रहिये कपड़े से आप सभी न साफ हो तो एक पत्थर तबियत से उछालियेगा आईना टूट जाएगा। मगर समाज में बदलाव नही आएगा और एक रोज़ ये रूप हमें ही खत्म कर देगा।

- देश दीपक सिंह

रविवार, 8 अप्रैल 2018

भाजपा के जागने का समय

लोक सभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ता एकदम उत्साह से परिपूर्ण दिखे। होना भी चाहिए था। आखिर पहली बार बीजेपी पूर्ण बहुमत से जीती थी। और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन रहे थे। आम जनता भी मोदी से पूरी उम्मीद लगाये बैठी थी। यह होना लाजमी था आखिर पहली बार चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया था। विदेश नीती हो या देश में सरकारी काम में तेजी। नरेन्द्र मोदी ने उसी उम्मीद पर खरा उतरने के लिए तमाम काम भी किये। इसी बीच बीजेपी ने सदस्यता अभियान का टेक्नोलजी से लैस एक प्रोफार्मा तैयार किया। जिसको पुरे देश में बहुत जोर शोर से शुरू किया गया। पुरे देश का बीजेपी कार्यकर्ता इस काम में पूरी तन्मयता के साथ लग गया। और विश्व रिकार्ड कायम करते हुए एक करोड़ से भी अधिक सदस्य बनाये। बीजेपी इस कामयाबी के लिए गिनीज बुक ऑफ़ वर्ड रिकार्ड से भी नवाजी गई। पर इस कार्य में कहीं न कहीं बीजेपी कार्यकर्ता उस मूल कार्य से हट गए जान पड़ते हैं जिसको लेकर वो लोक सभा चुनाव में उतरे थे और जनता ने भी उनसे जिसके लिए उम्मीद लगाई थी। अब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह खुद सदस्यता अभियान का जमीनी हाल जानने की कोशिश करेंगे। वह 20 मार्च से अपना यह काम शुरू करेंगे। अमित शाह की सदस्यता अभियान को लेकर गंभीरता पार्टी हित के कुछ मायनों में बहुत अच्छी हो सकती है। पर इसका दूरगामी परिणाम अच्छा हो यह सोचनीय है। आखिर जब पार्टी के सभी कार्यकर्ता सिर्फ सदस्यता अभियान में ही लगे रहेंगे तो उनसे जनता के बीच में काम करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव बेहद नजदीक हैं। जहां सपा अपने आप को दुबारा सत्ता में लाने के लिए तेजी से काम करने की कोशिश कर रही है। बसपा अभी से चुनाव की तैयारियों में लगी हुई है। वहीं भाजपा का सिर्फ सदस्यता अभियान में ही लगे रहना उसके लिए संकट न खड़ा कर दे। इधर प्रदेश सरकार द्वारा कई ऐसे कार्य किये गए जिसके लिए तमाम विरोधी दल सड़कों पर उतरे, ट्रेन रोकी, विधान सभा में विरोध किया। फिर वो चाहे कानून व्यवस्था को लेकर विरोध रहा हो या फिर भूमि अधिग्रहण संसोधन रहा हो। मगर भाजपा सिर्फ सदस्यता अभियान में ही मशगूल दिख रही है। भाजपा को अगर यह लगता है कि जिस तरह से लोक सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसे जीत मिली है वैसी ही जीत उसे 2017 के विधान सभा चुनाव में मिलेगी। भाजपा को अभी से जमीनी हकीकत पर उतर कर जनता के बीच में जुटना होगा। वरना 2017 की कुर्सी प्रदेश में आसान नहीं।

देश के मूल को न भूलें


जिस देश ने भारत पर 200 साल तक राज किया हो। जिसने वो हर कदम उठाये जिसे आज भी सुन कर हमारा दिल सिहर उठता है। जिस वक्त हमारा देश गुलामीं की जद में था उस वक्त के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को अध नंगा फकीर कह कर मजाक उड़ाया हो। उसी देश में उस अध नन्गे इंसान को सलाम किया जाए। उसकी मूर्ति लगे। और यही नहीं महात्मा गांधी की मूर्ति उसी इंसान के साथ जिसने ऐसा मजाक किया हो। ये सपना भी लगता है और गर्व का समय भी। कुछ ऐसा ही हुआ ब्रिटेन के ऐतिहासिक पार्लियामेंट स्क्वेयर में जहां शनिवार महात्मा गांधी की मूर्ति का अनावरण किया गया। समारोह में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून, वित्त मंत्री अरुण जेटली, महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी और महानायक अमिताभ बच्चन भी शामिल हुए। कांस्य की इस मूर्ति को मशहूर शिल्पकार फिलिप जैक्सन ने तैयार किया है। महात्मा गांधी ऐसे विरले महापुरुष हैं, जिनकी भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका के बेलेवू में स्थित एस्फोर्ड पार्क प्लाजा, अस्ट्रेलिया के केनबरा में स्थित ग्लेब पार्क, चीन के बीजिंग स्थित शाओयेंग पार्क, और रूस के मास्को स्थित स्टेट फारेन लिटरेचर लाइब्रेरी समेत 70 से ज्यादा देशों में मूर्तियां लगी हुई हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड ने कहा कि यह प्रतिमा विश्व राजनीति के सर्वकालिक शिखर पुरुषों में से एक को दी गई शानदार श्रद्घांजलि है। उनकी ज्यादातर शिक्षाएं आज भी बेहद प्रासंगिक और भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी हैं। महात्मा गांधी की इस मूर्ति के कई मायने हैं। ये सिर्फ हमें विश्व में अपने नाम की और ज्ञान की महत्ता को ही नहीं दर्शाता बल्कि इससे हमें भी बहुत शिक्षा मिलती है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि आज पूरा विश्व हमारे देश के विचार से प्रभावित हो रहा है। क्या वाकई में हम विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। अगर ऐसा है तो इसके लिए हम क्या प्रयास कर रहे। सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने नेताओं के भाषण ही पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए हमे अपने उस मूल को भी पकड़ना होगा जिसके लिए आज भी पूरा विश्व भारत देश का आभार मानता आ रहा है। ब्रिटेन में लगी ये मूर्ति अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से कितनी सही है, यह भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर कितना प्रभाव डालेगी। ये तय करना अभी जल्दबाजी होगा। पर इससे हम यह सीख जरूर लें कि कोई भी देश अगर विश्व स्तर पर अपने आप को स्थापित करता है तो वह उसका मूल है, उसका इतिहास है।

तीन साल- दर्द या मरहम

सरकारें आती हैं चली जाती हैं पर हम यहीं रहते हैं। देश के विकास की धारा में या तो हिस्सा बनकर या उसकी उम्मीद के लिए। पर इसका मुख्य कर्ता कौन है? सरकार। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार को आज तीन साल पुरे हुए। सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने में जुटी है और विपक्ष नाकामियां। पर इसका अर्थ क्या हुआ? क्या ये दिन भी वैलेंटाइन डे की तरह है कि जिसे अच्छा लगा वो तारीफ करे? जिसे नहीं वो बुराई। खैर ये राजनीति है हमे इसके लाभ और हानि से मतलब नहीं। हमे तो ये जानना है कि क्या 2012 में जो फैसला हमने लिया था वह सही था ? क्या वाकई में हमें जो सपने सपा सरकार ने दिखाए थे, जो संकल्प हमारे सामने लिए थे वो पूरे कर दिए हैं। कुछ पहलुओं पर देखें तो शायद कोशिश की गई है। पर कई ऐसे भी पहलू हैं जहां हमें वाकई धोखा सा लगता है। सरकार की तमाम ऐसी योजनाएं जो शायद सपा का पूर्ण बहुमत से सरकार में आने के मुख्य बिंदु थे उन्हें ही सरकार ने बंद कर दिया। उदाहरण के लिए बेरोजगारी भत्ता, लैपटॉप, टेबलेट, कन्या विद्याधन, आदि। मेट्रो, एक्सप्रेस-वे जैसी योजनाएं जनता को लुभा भी रही हैं। क्या वाकई में सिर्फ इसी के लिए हम सरकार चुनते हैं? शायद नहीं। हमारी ज़रुरत सुरक्षा, बिजली, पानी, रोजगार, जैसी छोटी छोटी चीज़ें हैं जिन्हें देने में अभी भी प्रदेश सरकार पूरी तरह से जनता के भरोसे पर खरी नहीं उतर सकी है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को अपने बेटे पर जितना भरोसा है उतना ही भरोसा प्रदेश की जनता ने भी किया था। पर परिवारवाद से उठ कर शायद इस बार भी सपा नहीं सोंच सकी है। 2017 का चुनाव अब बहुत दूर नहीं है और देश के सबसे बड़े प्रदेश की फिलहाल जो स्थिति बनी हुई है ऐसे में सपा को आत्म मंथन करने की ज़रुरत है। कहीं ऐसा न हो कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा को अप्रत्याशित नतीजे देखने को मिलें। आप के बड़े बड़े अच्छे कार्यों पर मूल रूप की खामियां इस कदर भारी पड़ रही हैं जो आप की मुश्किलें बढ़ा देने के लिए काफी हैं। जैसे कि अपराध, परिवारवाद, कोई भी ठोस कदम न उठाना। यादव वाद भी इसका मुख्य कारण है। मुलायम सिंह यादव आप देश के बड़े ही माहिर राजनेताओं में से हैं। ऐसे में आप की सरकार का लगातार गिर रहा ग्राफ आप कि राजनीति पर भी सवाल खड़े कर रही है। जनता को जो भी दर्द मिला हो या उसे मरहम मिला हो। इसका फैसला तो 2017 में होगा। पर आप ज़रुर इसे ध्यान रखें कि अगर अभी नहीं चेते तो जनता फिर कभी शायद ध्यान न दे।

आप का मैं में परिवर्तन

आम आदमी पार्टी यानी कि आप। इसकी परिभाषा जो अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी बनाते वक्त दी थी वो कुछ इस तरह थी कि यह आम जनता की पार्टी है। भारत देश के हर इंसान की पार्टी है। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों के इस विचार पर समीर अनजान का लिखा और हिमेश रेशमिया का गाया वो गाना भी बिलकुल फिर बैठता है “तुम और मैं गर हम हो जाते”। पर हाल ही में पार्टी की अन्तह् कलह को देखते हुए पार्टी की सोंच कुछ इस तरह से जान पड़ती है कि चलो बस हो चूका मिलना, न तुम खाली न हम खाली। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, अंजलि दमानिया, मयंक गांधी के बाद अब पार्टी की बिहार यूनिट के प्रमुख बसंत कुमार चैधरी ने अपने राष्ट्रीय नेतृत्व पर व्यक्तिवाद और स्वार्थ की संस्कृति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। चैधरी ने कहा, ‘आज पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र की जगह स्वार्थी लोगों ने ले ली है। पार्टी अपने अंत की तरफ तेजी से बढ़ रही है। अब बातचीत का केंद्र ताकतवर नेतृत्व बन गया है। भ्रष्टाचार से दूर रहने और आंतरिक लोकतंत्र जैसी बातें अब अर्थहीन हो गई हैं। पार्टी की तरफ से मोर्चा संभाले वाक्पटुता के धनी कुमार विश्वास का कहना है कि ये लोग पार्टी को बुरी स्थिति में दिखाने के लिए साजिश करते हैं। कुमार विश्वास ने आप के पूर्व विधायक राजेश गर्ग पर भी आरोप लगाए हैं।  विश्वास के अनुसार राजेश गर्ग ने ही इस ऑडियो स्टिंग को मीडिया में रिलीज किया है। उसने ही यह टेप एक पत्रकार को उपलब्ध कराया था। उन्होंने इस बात पर विश्वास जताते हुए कहा कि वे लंबे समय से ऐसे लोगों के बीच काम कर रहे हैं उन्हें ऐसे लोगों से निपटना और ऐसी स्थितियों से उबरना आता है। ये तो बयान हैं। खैर अगर हम पार्टी के बनते वक्त की बात करें तो योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से विचार विमर्श के बिना कभी भी अरविन्द केजरीवाल ने कोई भी कदम नहीं उठाया था। जिस सोंच और संकल्प के बीच इस पार्टी ने जनता का विश्वास जीता है क्या वह इस अंतर विरोध के बाद बचा रहेगा। क्या पार्टी वाकई में कुछ खास लोगों के ही मध्य सिमट के रह गई है। कुमार विश्वास का यह कहना कि अरविन्द केजरीवाल जब बीमार होते हैं तभी विरोध उत्पन्न होता है। ये कहीं इस बात का इशारा तो नहीं कि अरविन्द केजरीवाल ही एक मात्र माध्यम हैं जो इन सब को एक साथ बांधे हुए हैं। वरना इस दल में कोई भी लोकतंत्र या एकमत विचार का समर्थक नहीं है।

विरोध, बंद नहीं साथ खोलने का काम कब

पुलिस गलत, अधिवक्ता गलत, राजनीति गलत, गुस्सा इतना कि देश पूरा पटरी से उतर सा गया है। पुलिस और वकील की एक लड़ाई। जिसमें शायद उन दोनों के पडोसी का भी कोई मतलब न रहा होगा। पर आज पूरा देश इसका दंश झेल रहा। वकील साहब न जाने कितने ऐसे बेगुनाह होंगे जिसे जेल से सिर्फ इस लिए नहीं रिहा किया जा रहा है क्योंकि आप काम नहीं कर रहे। आप का गुस्सा है कि मेरे एक अधिवक्ता भाई को गोली मारी गई है और वो मर गया है। बेशक उस पुलिस वाले को सजा मिलनी चाहिए। आखिर वो रिवाल्वर लेकर कचहरी में आया कैसे। और फिर झगडा हुआ भी आप से तो गोली मारी वो भी गलत। आप तो कानून के संरक्षक हैं। आप के हांथ में सब कुछ है लटकवा दीजिये उसे फांसी पर। पर इस विरोध को रोकिये। क्योंकि इस विरोध से न जाने कितने ऐसे लोग जीते जी मर रहे हैं जिनकी आखरी आस ही आप कि कचहरी है। ये सवाल तो था वकीलों से अब सवाल प्रशासन से है। आप किस प्रकार का रवैया अपनाना चाहते हैं वकीलों के विरुद्ध। रात में गैर कानूनी तरीके से तहसील को हस्तानांतरित करने का काम करते हैं। विरोध होता है तो लाठियां चलाते हैं। फिर विरोध होता है फिर लाठियां चलती हैं। सरकार जागती है और प्रशासन के ज़िम्मेदारों को तलब करती है। बस सरकार का भी काम पूरा हो जाता है। आखिर कब तक इस तरह आप सभी आम जनता को ढाल बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहेंगे। आखिर ये विरोध, ये आक्रोश किसके लिए है? बार काउंसिल ऑफ इंडिया का भी कार्य बहिष्कार करना कितना सही और कितना गलत है ये कोई और नहीं बल्कि अधिवक्ता भाई खुद ही तय करें। आखिर आप भी देश के एक स्तम्भ का अंग हैं। सवाल आप से भी बनते हैं। विरोध कब तक होगा ? एक बार जरा साथ में विरोध करने नहीं बल्कि विरोध को रोकने के लिए काम करें। ये देश आप का है। ये विरोध, ये बंद आपके अहम को तो शांत कर सकता है। पर क्या देश के अहम को बरकरार रख सकता है? क्या हमारे देश में विरोध को ही विकास का रास्ता समझा जाता है? एक बार विरोध नहीं, बंद नहीं साथ में देश के विकास और सुरक्षा के मार्गों को खोलने का काम करें।

मोदी की सरकार का तेवर नज़र नहीं आता

जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई पर पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह और फिर बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दिया। लेकिन विपक्ष उनके बयान से संतुष्ट नहीं हुआ। दोनों ही नेताओं ने कहा कि उनके स्वर भी सदन के सदस्यों के आक्रोश के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने सदन को बताया कि जम्मू कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वो बिना केंद्र सरकार के मशविरे से हो रहा है। मोदी ने कहा, आक्रोश दल का नहीं, यह आक्रोश उस तरफ की बेंचों या इस तरफ की बेंचों का भी नहीं बल्कि पूरे देश का है। हम एक स्वर से अलगाववाद को समर्थन करने वालों के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करते हैं। इससे पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोक सभा को बताया कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के गृह विभाग से मसर्रत आलम बट की रिहाई के बारे में स्पष्टीकरण माँगा है। बट के खिलाफ 1995 से कुल 27 मामले दर्ज हैं जिनमें देश द्रोह के भी मामले हैं। कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि अगर भाजपा की सहमति के बिना जम्मू-कश्मीर सरकार ऐसे कदम उठा रही है तो भाजपा पीडीपी सरकार से अलग क्यों नहीं हो जाती ? मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न होने का श्रेय पाकिस्तान और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत अलगाववादियों को भी दिया, पीडीपी के विधायकों ने संसद हमला कांड में फांसी पर चढ़ाए गए आतंकवादी मोहम्मद अफजल के अवशेष मांगे और उसके बाद आलम की रिहाई हुई। इन पुरे हालातों को देख कर केंद्र सरकार का घिरना तय ही था। नरेन्द्र मोदी ने जो भी सदन में कहा वो सुनने में तो बहुत ही अच्छा लग सकता है पर शायद समस्या का यह निदान नहीं है। जिस जम्मू कश्मीर को हम देश की जन्नत कहते हैं वहां इस तरह की घटनाएं देश के लिए कभी भी सही नहीं हो सकती। रही बात भाजपा कि तो यह कहना किसी भी तरीके से ठीक नहीं जान पड़ता कि यह पूरा निर्णय सिर्फ और सिर्फ जम्मू कश्मीर की बीजेपी इकाई का है। नरेन्द्र मोदी जी आप को इस बात का भी ध्यान रखना होगा की जम्मू कश्मीर सरकार में बने रहने की आप की महत्वाकांक्षा कहीं पुरे देश में आप को नुक्सान न पहुंचा दे। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि जम्मू-कश्मीर सरकार बचाए रखने के लिए भाजपा कितनी नरमी बरतेगी? भाजपा के बयान और उनके स्पष्टीकरण में कहीं भी नरेन्द्र मोदी की सरकार का तेवर नज़र नहीं आता। जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र का सपना आप की सत्ता की चाहत कहीं सपना ही न बना रहने दे।

विकल्प हमेशा ही जनता के हाँथ में है

भारतीय राजनीति में उसे बहुत पसंद किया जाता है जो बेहतर वक्ता होता है। जो हाजिर जवाबी होता है। जिसे हर सवाल का बेहतर तरीके से जवाब देना आता है। फिर वो चाहे सदन में पूंछा गया हो या मीडिया द्वारा। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री को राजनीति में कच्चा खिलाडी माना जाता रहा है। लेकिन कुछ महीनों में देखें तो अखिलेश यादव जिस तरह से सदन में जवाब देते दिखते हैं। मीडिया को जवाब देते दिखते हैं वो कहीं न कहीं राजनीति के अच्छे लक्षण ही जान पड़ते हैं। मंगलवार को सदन में अखिलेश यादव ने राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा जो कि सर्वसम्महति से पास हो गया। इस बीच सीएम ने विपक्षियों की जमकर चुटकी भी ली। सीएम सदन में आए और अपना धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा। उन्होंने अपने हाजिर जवाबी से यह भी साबित कर दिया कि वे पक्के राजनीतिक व्यक्ति बन गए हैं। मंगलवार को सदन में सीएम अखिलेश ने सरकार की योजनाओं का जमकर बखान किया और बीच-बीच में विपक्षियों पर हमले भी किए। बातों-बातों में ही सीएम ने नेता प्रतिपक्ष को सपा में शामिल होने का न्योता भी दे दिया। धन्यवाद प्रस्ताव के शुरुआत में ही सीम अखिलेश ने चुटकी लेते हुए कहा कि सुना है नेता प्रतिपक्ष कह रहे हैं कि सपा सरकार की योजनाएं झुनझुना है। वहीं, एक दल कहता है कि ये योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही लागू हंै। सीएम ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष सपा सरकार के झुनझुने की तारीफ कर चुके हैं। सीएम ने स्वामी प्रसाद मौर्या पर चुटकी लेते हुए कहा कि जब एक्सप्रेस-वे बन जाएगा तब आपको साथ घुमाने जरूर ले जाएंगे। सीएम अखिलेश यादव ने मायावती पर निशाना साधते हुए कहा कि जो हाथी पुरानी सरकार ने बनवाए थे, वह खड़े ही रह गए हैं। सदन में अखिलेश यादव ने कहा कि एक दल कह रहा था कि 24 घंटे बिजली देंगे, लेकिन यह नहीं बताया कि 24 घंटे बिजली देंगे कैसे? सीएम ने कहा कि 24 घंटे बिजली आपूर्ति के लिए सपा सरकार लगातार काम कर रही है। अखिलेश यादव के इस तरह का बयान दिया जाना उनका राजनीति के लिए परिपक्व होना दर्शाता है। पर इस बात का ध्यान रखना होगा की आप अपनी वाक्पटुता से भले ही राजनीति के लिए तैयार हो गए हैं पर अब जनता बातों से मानने वाली नहीं है। काम करके दिखाइए जनता आपका साथ देगी। वरना विकल्प हमेशा ही जनता के हाँथ में रहता है।

विरोध कितना सही

अक्सर आप पर सवाल उठे हैं। आप की एकता से सभी डरते भी हैं। इसकी मिसाल भी देते हैं। अच्छी बात है की आप में इतनी एकता है। कहा भी जाता है कि एकता में ही शक्ति है। पर क्या यह शक्ति आप की सही दिशा में लग रही है ? क्या वाकई में आप इस शक्ति के माध्यम से देश में एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में आप के द्वारा तमाम प्रकार के विरोध प्रदर्शन किये गए। जिसका खामियाजा उस इंसान ने भरा हो या नहीं जिसका आप विरोध कर रहे थे। पर आम जनता को उसने काफी हद तक बेहाल कर दिया। किसी की जान गई और किसी ने पहली सांस भी उसी जाम में ली। इस बार फिर से आप विरोध कर रहे। तहसील का ट्रान्सफर होना सही है या नहीं ये तो वही बता सकता है जिसका उससे अक्सर वास्ता पड़ता रहता है। ये भी सही है कि उसकी दूरी आप को भी खल रही है। पर जिस तरह का आप का विरोध है। जरा सोंचिये की इसकी वजह से न्यायालय में आने वाले फरियादियों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। आप की मांगे जायज़ हो सकती हैं पर उसका विरोध सीधे आम जनता को कष्ट दे कर हो कहां तक सही है ये। आप खुद तय करें। पुलिस द्वारा आप पर हुए लाठीचार्ज को कोई भी सही नहीं मानता पर क्यों नहीं ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे आप के बुद्धजीवी होने के पद पर सवाल न खड़ा किया जाए। जिस तरह से आप की छवि पर उंगलियां उठने लगी हैं। ये आज तो नहीं पर आने वाली आप की ही नई पौध के लिए कितनी घातक साबित होगी इसका अनुमान आप खुद हि लगा सकते हैं। ऐसा न हो कि लोग अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए आप का साथ लेने से भी कतराने लगें। इसके लिए बेहतर होगा कि समय रहते ही आप गंभीरता से इस पर विचार करें और अपने विरोध के तरीके को थोडा सा बदलें ताकि आप की मांगें भी पूरी हो सकें और आम जनता को भी कोई दिक्कत न हो।   




   

एक दिन ही क्यों

महिला दिवस की सभी को खूब बधाई मिली फेसबुक रहा हो या वाट्स एप  सभी जगह महिला दिवस की बधाई की धूम मची हुई थी द्य हर इंसान देश की अधि आबादी का सम्मान करना चाह रहा था द्य दिल खुश था महिलाओं में भी ख़ुशी दिख रही थी द्य पर क्या वाकई में ऐसा हुआघ् दिल से सभी ने इस दिन को मनाया था क्या घ् क्या वाकई में आज की नारी इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार करती है की एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन लोग उनका सम्मान करेंगे घ् क्या इस देश को इस दिवस की वाकई में ज़रुरत हैघ् पूरी दुनिया में रविवार को एक ओर जहां अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था ए महिला सशक्तिकरण और उन्हें सम्मान देने की बात हो रही थी ए तो दूसरी ओर यूपी पुलिस का बर्बर चेहरा भी देखने को मिला द्य उन्नाव में शनिवार को एक सड़क हादसे के बाद विरोध.प्रदर्शन कर रही महिला को मौके पर पहुंचे पुलिस वालों ने लात.घूंसे से जमकर पीटा द्य रविवार को उन्नाव पुलिस अधीक्षक और गंगा घाट के थानाध्यक्ष को इस मामले में सस्पेंड कर दिया गया। वहींए दो पुलिसवालों को लाइन हाजिर किया गया है। इसके अलावा सड़क हादसे में मारे गए युवक के घरवालों को दो लाख रुपए मुआवजे का एलान किया गया है। दूसरी घटना है इलाहाबाद में हुई जहाँ एक युवती से रेप का प्रयास करने की घटना ने पूरे इंसानियत को शर्मसार कर दिया। बताया जा रहा है कि युवती जब शौच के लिए सुबह खेत में गईए इसी दौरान गांव के ही एक युवक ने इस वारदात को अंजाम देने की कोशिश की। फिलहाल पुलिस ने केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। तीसरी खबर पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा लखनऊ में बनाये गए साइकिल ट्रैक पर महिलाओं ने साइकिल चलाई द्य और उन्हें आजादी का भरोसा दिलाया गया द्य साड़ी घटनाओं को देखने के बाद तो यही लगा की शायद उत्तर प्रदेश में इस दिवस का महत्व अन्य दिवसों से कुछ भी अलग नहीं द्य हर साल की तरह इस साल भी ये दिवस आया बड़ी बड़ी बातें हुई और कुछ नहीं द्य उन्नाव और इलाहाबाद की घटनाओं ने सरकार और प्रशासन पर तो सवाल खड़े ही किये हैं पर साथ ही हम पर भी ऊँगली उठी है द्य क्या वाकई में हम तैयार हैं देश की अधि आबादी को वो सम्मान और आजादी देने के लिए जिसके लिए वो न जाने कब से संघर्ष कर रही हैं घ् या देश की नारी अभी भी इस इंतज़ार में है कि हम उन्हें ये सब देंगे घ् चलिए दिवस आया और गया भी ए पर सवाल फिर वहीँ खड़ा है कि कब वह दिन आएगा जब हम आप को किसी विशेष दिन ये संकल्प लेने के लिए नहीं खड़ा होना होगाद्य



   

विरोध कितना सही

एक बार फिर हंगामा हुआ है। वजह है निर्भया कांड पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज डॉटर’। हंगामा क्यों है समझना भी ज़रुरी है। इसमें पहला सवाल है जो बहुत हद तक जायज लगता है वह यह कि क्या इसकी शूटिंग के दौरान जेल नियमों की अवहेलना हुई। डॉक्यूमेंट्री की ब्रिटिश निर्माता लेसली उडविन का दावा है कि उन्होंने 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीय युवती के साथ हुए दुराचार के सजायाफ्ता मुजरिम मुकेश सिंह से इंटरव्यू लेने के लिए तमाम प्रक्रियाएं पूरी की थीं। इसमें कितनी सच्चाई है ये तो जांच होने के बाद ही पता चल सकेगी। इसके इतर एक सवाल जो और भी गंभीरता से उठाया जा रहा है कि क्या अपराधी को अपना पक्ष किसी फिल्म में या सार्वजनिक मंच पर रखने का मौका दिया जाना चाहिए। मुजरिम सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बातें कहता है, तो क्या उसे जनसंचार के माध्यमों पर प्रसारित किया जाना चाहिए? यह वो प्रश्न हैं जो फिलहाल पूरे देश में बहस का मुद्दा बने हुए हैं। हो सकता है कि कुछ लोग इसे गलत मानें और इस मामलें में तो यह विचार भी काम कर रहा है कि अपराधियों ने अकथनीय क्रूरता दिखाई, उन्हें मंच देना अवांछित और अनौचित्यपूर्ण है, मगर एक विचार यह भी है कि दुष्कर्म सामान्य अपराध नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऐसी सांेच काम करती है, जिसकी जड़ें समाज में हैं। ऐसे में दुष्कर्म की मानसिकता को समझना ऐसे अपराधों को रोकने के उपाय करने के लिहाज से उपयोगी हो सकता है। मुकेश सिंह ने जो कहा बेशक उससे महिलाओं को लेकर उसकी पतित सोंच जाहिर होती है, और जिस तरह से इस पूरी डॉक्यूमेंट्री में वकीलों के बयान भी दिखाए गए। और उनका यह कहना कि हमारे समाज में लड़कियों का रात में किसी भी व्यक्ति के साथ बाहर जाना किसी भी तरह से सही नहीं है। यह बयान और भी कई सवालों को जन्म देता है। इस डॉक्यूमेंट्री में जो भी दिखाया गया है उसका विरोध कितना सही है यह तो आप जनता तय करे पर यह भी सच है कि इस डॉक्यूमेंट्री को नकारात्मक
सोंच के साथ नहीं देखा जाना चाहिए। यह मुमकिन है कि यह डॉक्यूमेंट्री अपने समाज के एक अप्रिय यथार्थ से हमारा साक्षात्कार कराती है। भारत में इसे दिखाने पर रोक लगाई जा चुकी है। और अब मामला न्यायपालिका के दायरे में है। निर्भया कांड ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। आज भी इसकी चर्चा महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों को उभार देती है। इसका विरोध दुखद है। अब उम्मीद न्यायालय से है कि उसका फैसला देश में एक मिसाल कायम करेगा।


   

एक्सप्रेस सी जिंदगी में रंगों का इंटरवल

जम्मू कश्मीर में बयान को लेकर विवाद है। भाई ये राजनीति है इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? अरविन्द केजरीवाल ने संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण से आप की अनबन है। इसमें बुरा मानने जैसा क्या है। विराट कोहली नाराज़ हैं उन्होंने पत्रकार भाई को अपशब्द कह दिए। इसमें भी बुरा मानने जैसा क्या है। ये देश तमान विसमताआंे से भरा हुआ है। यहां कई रंग हैं। कई भाषाएं हैं। तमाम विचारधाराएं यहां एक साथ आपस में हमेशा युद्ध लड़ती रहती हैं। पर इसमें बुरा मानने जैसा क्या है ? और वो भी ऐसे समय में जब त्यौहार ही बुरा न मानने का हो। होली का त्यौहार है जिसमें हमेशा ही हम बुरा न मानो होली है कहते हैं और वो सब कार्य करते हैं जो आम दिनों में किसी को भी बुरा महसूस करा सकते हैं। खैर इस त्यौहार में आइये हम सब मिल कर इन तमान बातों पर खुशी के रंग डालें और एक दुसरे से इस कदर मिलें कि देश की एकता और अखंडता को पूरी दुनिया में फिर से स्थापित करें। वैसे भी भारत हमेशा से ही तमाम विसमताओं को लेकर जिया है और जीता भी है। फिर वो धार्मिक विसमता हो, आर्थिक विसमता हो, वैचारिक विसमता हो, बोली की विसमता हो या क्षेत्र की विसमता हो। आइये फिर से एक हों और अबीर गुलाल के तमाम रंगों में रंग कर एक इंटरवल लें ताकि हमारी आपकी एक्सप्रेस की तरह भागती ज़िन्दगी में कुछ पल साथ के हों। पर ये ज़रुर ध्यान रहे कि किसी को कोई नुक्सान न हो, रंग हों, गुजिया हों, मीठा नमकीन हों, पर हेल्थ फ्रेंडली हों। देश हमारा है, लोग हमारे हैं, त्यौहार हमारा है रंग में भंग न पड़े तो अच्छा है। उन लोगों को भी नम आँखों से होली मुबारक जिन्होंने किसी भी कारण से अपने किसी को खो दिया हो। शहरवासियों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।     






   

आप की लड़ाई

अन्ना आन्दोलन हुआ, कई बड़े लोग एक साथ आये। एक समूह तैयार हुआ। फिर फूट पड़ी और एक समूह दो भागों में बट गया। एक भाग अपने उसी उद्देश्य के साथ चल रहा था। दूसरा भाग जो कभी भी राजनीति में न आने की कसम खाए बैठे था वो राजनीति में आ गया। आम आदमी पार्टी बनाई और देश को गरीबी से मुक्ति तो नहीं पर कांग्रेस और भाजपा से मुक्ति दिलाने के लिए जनता के बीच में आ गए। खूब महनत हुई और शुरुआत दिल्ली चुनाव से की। चुनाव लड़े और अप्रत्याशित जीत भी दर्ज की। सरकार बनाई और अतिवादिता के चलते 49 दिन में ही सरकार गिरा भी दी। उतर पड़े लोक सभा चुनाव में और 4 सीट भी जीती। इसी बीच दिल्ली में सरकार न चलने के कारण पुरे देश में इसका विरोध भी झेला। दुबारा फिर दिल्ली में चुनाव हुए और इस बार और भी बेहतर प्रदर्शन कर सरकार बनायी। पर इस बार भी सरकार बनते ही फिर से पार्टी में विरोध उत्पन्न हो गया है। इस बार का विरोध कार्यकर्ता द्वारा नहीं बल्कि पार्टी को स्थापित करने वाले दो अहम लोगों का है। ये विरोध किसी और बात को लेकर भी नहीं, वही पुरानी बात कि पार्टी का मुखिया कौन ? पार्टी किसकी ? ये कोई पहली पार्टी नहीं है जिसमें इस बात को लेकर विरोध हुआ हो। इसी तरह का विरोध कांग्रेस भी झेल रही है और इसका हश्र भी वो देख चुकी है। हाल ही में बिहार में नितीश कुमार की पार्टी में कुछ ऐसा ही विरोध देखने को मिला था। जिसके चलते नितीश को भी काफी नुक्सान उठाना पड़ा। उत्तर प्रदेश में सपा पर भी इसी तरह के आरोप लगते रहे हैं और इसका नुक्सान भी उसे कई बार झेलना पड़ा है। ऐसे में आप पार्टी में आया ये विरोध एक बहुत बड़े निराशा का संकेत देता है। अगर वाकई यह पार्टी आम जनता के लिए ही बनी है तो इसमें अलाकाम, परिवार वाद जैसे आरोपों का लगना बेहद ही दुखद है। योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेता अगर पार्टी से हटाये जाते हैं या वो खुद पार्टी से त्यागपत्र देते हैं तो यह पार्टी के लिए जनता के बीच बहुत ही गलत सन्देश देगा। अरविन्द केजरीवाल को इस बात का ख्याल ज़रुर रखना चाहिए की फर्श से अर्श तक जितनी तेजी से आप पहुंची है अगर उसे गंभीरता से नहीं संभाला तो अर्श से फर्श तक आने में भी समय नहीं लगेगा।

   

क्या अब साफ होगी राजनीति

भारत देश में एक अजीब सोंच काम करती है कि जो जितना ज्यादा बाहुबली है, जो जितना ज्यादा ताकतवार और पैसे वाला है वही राजनीति में आ सकता है और जीत सकता है। ऐसी सोंच शायद इस लिए भी है क्योंकि इन प्रभावशाली लोगों से ही शायद जनता काम की उम्मीद करती है। पर ऐसा है नहीं। भारत देश में राजनीति में आप इन सब के बल पर दाखिल तो हो सकते हैं पर आप कभी राजनीति के उच्च पद पर बैठ नहीं सकते। जनता इतनी भी भोली नहीं। इधर कई वर्षों से यह देखने को मिला कि संसद हो या विधानसभा सभी जगह आपराधिक पृष्ठ के लोग जनता के प्रतिनिधि के रूप में प्रवेश कर रहे। अगर किसी के खिलाफ कोई मामला चल भी रहा है तो न्यायपालिका की लम्बी प्रक्रिया के चलते उसका कोई नुक्सान नहीं होता। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति को स्वच्छ बनाने की अनेक पहल की है। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अब उसने हर हाईकोर्ट में एक विशेष बेंच बनाने का निर्देश दिया है, ताकि चुनाव याचिकाओं का जल्द-से-जल्द निपटारा हो। छत्तीसगढ़ में पराजित उम्मीदवार की याचिका पर निर्णय देते हुए जस्टिस जे. चेलामेश्वर और जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन की खंडपीठ ने कहा कि कोई सांसद या विधायक अवैध साधनों का इस्तेमाल करते हुए निर्वाचित हुआ हो, तो उसे एक दिन भी अपने पद पर नहीं रहना चाहिए। किंतु ऐसा बहुत कम होता है, जब निर्वाचित प्रत्याशियों के खिलाफ दायर चुनाव अर्जियों का निपटारा उनके कार्यकाल में हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में दो अहम बातें स्वीकार कीं। पहली यह कि इस देर से न्यायिक प्रक्रिया का मखौल उड़ता है और दूसरे यह कि इससे न्यायपालिका की आलोचना की वजह मिलती है, जिससे उसकी साख प्रभावित होती है। अब न्यायपालिका ने अपनी और विधायिका दोनों कि साख को सुरक्षित करने का प्रयास किया है। खंडपीठ का यह सुझाव भी स्वागतयोग्य है कि उच्च न्यायालयों में प्रस्तावित विशेष पीठ में शामिल न्यायाधीशों पर चुनाव अर्जी की सुनवाई पूरी होने तक दूसरे कामकाज का बोझ न डाला जाए। उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों ने अगर तत्परता से इन निर्देशों पर अमल किया तो देश एक बड़ी न्यायिक विसंगति से बच जाएगा। देश की राजनीति और न्यायपालिका के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय बेहद ही सराहनीय है। और शायद भारत देश की जनता इस निर्णय के चलते एक बेहतर राजनीति का स्वरुप देख सकेगी। इसका ध्यान ज़रुर रहे कि इस सपने को पूरा करने में आम जनता की भी भागीदारी है।

   

साहित्य का अस्तित्व

हिन्दुस्तान को साहित्य का देश कहा जाता है। शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां साहित्य को पसंद करने वाले लोग न हों। ऐसे में यही माना जाता है कि देश का साहित्य में भविष्य बहुत ही उज्जवल है। पर क्या ऐसा सही में है? क्या वाकई में साहित्य का जो स्तर रहा है भारत में अब भी वही है? शायद नहीं। हाल ही के कुछ वर्षों में साहित्य की लेखनी और उसकी पसंद में काफी हद तक बदलाव आ गया है। इसकी वजह भी है। जब देश में हिंदी भाषा को ही कई बार खतरे में ला कर रख दिया गया हो वहां हिन्दी साहित्य को कौन पढ़ना चाहेगा। जहां स्कूलों और विश्वविद्यालयों में ही हिन्दी की पढ़ाई को मात्र औपचारिकता माना जाता हो वहां साहित्य का स्तर क्या होगा ये भी समझाने की ज़रुरत नहीं। इधर बीच कई साहित्य सम्मेलनों और कवि सम्मेलनों में जाना हुआ। जहां अमूमन हर कवि, शायर, साहित्यकार यही कहता नज़र आया कि देश में साहित्य का स्तर काफी गिरता जा रहा है। जिसमें खास तौर से हिंदी और उर्दू का साहित्य है। इसकी वजह को तलाशने कि कोशिश की तो पता चला अब भारत में युवा पढ़ने में दिलचस्पी नहीं लेते। दूसरा कि नेट क्रांति के चलते अब लोग ऑनलाइन ही पढ़ना पसंद करते हैं। ऐसे में हिंदी साहित्य ऑनलाइन उपलब्ध कम हो सका है। तीसरी सबसे बड़ी वजह साहित्य का बाजारवाद में शामिल होना। इसको लेकर तमाम बार बहस भी हो चुकी है और साहित्य क्षेत्र के लोगों ने भी इसपर घोर आपत्ति जताई है। उनके अनुसार अब साहित्य पढ़ने के लिए नहीं बल्कि बेचने के लिए लिखा जाता है। और साहित्य का बेचना भी एक प्रबंधन का रूप ले चूका है। इन परिस्थितियों को देखने के बाद तो यही लगता है कि अगर अब भी साहित्य को पैसे की जगह शाब्दिक और वैचारिक रूप से अमीर नहीं बनाया गया तो साहित्य भी इतिहास में गिना जाएगा। इसके लिए साहित्यकार, पाठक के साथ साथ सरकारें भी ज़िम्मेदार हैं जो साहित्य जगत की बढ़ोत्तरी के लिए सिर्फ औपचारिकता न पूरी करे बल्कि साहित्य जैसे गंभीर विषयों पर ठोस कदम उठाये। साहित्य विचोरों का संग्रह है और अगर विचार ही खत्म हो गए तो देश के सतत विकास का सपना सिर्फ सपना मात्र ही रह जाएगा।    

बोझ उतना जितना बर्दास्त हो

2022 तक खत्म होगी गरीबी। संसद में जब आम बजट पेश करते वक्त वित्त मंत्री अरुण जेठली ने यह घोषणा की तो सभी विपक्ष की नींद ही उड़ गई। पक्ष ने खूब तालियां बजा कर इसका स्वागत किया। बेहतर है की आम बजट में गरीबी खत्म करने की बात की गई है। पिछले साठ साल से हम यही सुनते आये हैं हर बजट में कि गरीबी कम की जाएगी। पर अगर अब हम गरीबी खत्म करने की बात कर रहे तो शायद कुछ बेहतर ही है। परन्तु इस पर कई सवाल भी हैं कि आखिर यह होगा कैसे ? सिर्फ सदन में इतना कह देने भर से गरीबी खत्म नहीं होती। अगर ऐसे में विपक्ष यह कहता है कि ये सिर्फ काल्पनिक बजट है तो शायद गलत नहीं है। वित्त मंत्री जी आखिर बातें करके आप जनता को यह तो बताना चाहते हैं कि बीजेपी सिर्फ गरीबों और आम जनता के लिए काम कर रही है। पर उसकी एक ठोस रूपरेखा नहीं बताई आप ने। ये कहना भी गलत नहीं है कि बीजेपी ने इस बार के आम बजट में परंपरागत बजट पेश करने की औपचारिकता मात्र नहीं की है। लेकिन ऐसा कहना की वाकई में ये बजट पूरी तरह से आम जनता का है तो भी गलत ही होगा। मोबाइल फोन, पानी की बोतल, रेस्टोरेंट में खाना, दवाइयां जैसी चीजें महंगी होना। टैक्स में कोई रियायत न मिलने से आम जनता में निराशा है। इसके साथ ही सर्विस टैक्स में बढोतरी, 2 प्रतिशत स्वच्छ भारत टैक्स ने भी जनता पर बोझ बढ़ा दिया है। विपक्ष इन्ही मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का मन बना रही है। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से देश में सफाई और विकास पर जोर देते हुए हर योजनाएं बनाने की बात की थी ऐसे में इस तरह का आम बजट कहीं न कहीं उनकी बातों को पूरा करता तो दिखता है पर जनता पर इतना बोझ कही आप को आने वाले चुनावों में भारी न पड़ जाए। मोदी जी बीजेपी की सरकार पहली बार पूर्ण बहुमत से बनी है। इस बात का जरुर ख्याल रखें कि भारत की जनता अभी इतना बोझ सहने के लिए तैयार नहीं है।  

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

भारत माता की जय

भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके भारतमाता या भारतम्बा कहा जाता है। भारतमाता को प्रायः केसरिया या नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में भगवा ध्वज लिये हुए चित्रित किया जाता है तथा साथ में सिंह होता है। वेदों का उद्घोष - माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः (भूमि माता है, , मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।) वाल्मीकि रामायण में - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी (जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उपर है।) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में भारतमाता की छवि बनी। किरन चन्द्र बन्दोपाध्याय का नाटक भारत माता सन् 1873 में सबसे पहले खेला गया था। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनन्दमठ में सन् 1882 में वन्दे मातरम् गीत सम्मिलित था जो शीघ्र ही स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य गीत बन गया। अवनींद्र नाथ टैगोर ने भारतमाता को चारभुजाधारी देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारण किये है। हाथ में पुस्तक, माला, श्वेत वस्त्र तथा धान की बाली लिये हैं। सन् 1936 में बनारस में शिव प्रसाद गुप्त ने भारतमाता का मन्दिर निर्मित कराया। इसका उद्घाटन गांधीजी ने किया। हरिद्वार में सन् 1983 में विश्व हिन्दू परिषद ने भारतमाता का एक मन्दिर बनवाया। शायद ये भारत माता की तस्वीर आप आज के समय में देखना पसंद करेंगे। पर क्या वाकई में हम देखने को पा रहे हैं। देश की आजादी में जब संचार के इतने माध्यम भी नहीं थे तब इसी शब्द ने हमे एक करके विदेशी ताकतों से लड़ने की शक्ति दी थी। इस भारत की धरती पर जिस तरह की घटनाएँ आज हो रही हैं क्या वाकई में इस शब्द का अर्थ यही है। वेदों और उपनिषदों में विश्वास रखने वाले क्या जिस भारत को माँ कहते हैं वो माँ ऐसे ही पुत्रों की उम्मीद करती है। क्या लाल सलाम की माला जपने वालों ने कभी किरन चन्द्र बन्दोपाध्याय का नाटक भारत माता नहीं देखा है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनन्दमठ को नहीं पढ़ा है। किस आजादी और आन्दोलन की बात हम कर रहे और किस तरह से। अवनींद्र नाथ टैगोर ने भारतमाता को चारभुजाधारी देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारण किये है। हाथ में पुस्तक, माला, श्वेत वस्त्र तथा धान की बाली लिये है और भारत का नक्शा हरे रंग से रंगा है साथ ही आसमान को नीले रंग से दर्शाया गया है। केसरिया रंग जो उमंग का प्रतीक है, पुस्तक जो ज्ञान का प्रतीक है, माला जो एक धागे में सभी के बराबर से पिरोए हुए होने का प्रतीक है, श्वेत वस्त्र जो शांति का प्रतीक है, धान की बाली जो हमारे मेहनतकश होने का प्रतीक है, हरा रंग हरियाली का और नीला रंग आकाश की ऊँचाइयों को छूने का प्रतीक है। आखिर क्या इसमें कही से भी रक्त विद्रोह, ऊँच - नीच, दलित- सवर्ण का भेद स्पष्ट किया गया है। देश जिन हालातों से गुजर रहा है उसमें इस बात का दोहराया जाना, भारत माता को परिभाषित किया जाना जरूरी जान पड़ता है। वकीलों, पत्रकारों, राजनेताओं और युवाओं की भूमिका में कहीं न कहीं वर्तमान के हालात पर कमी नज़र आती है। उम्मीद करते हैं कि जिस देश की आवाम ने जिस भारतमाता के नाम पर एक हो कर भारत को आज़ाद कराया था। जिस भारतमाता के नाम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक होकर सड़क से संसद तक गंभीरता दिखाई थी। आज उस भारतमाता के नाम पर भारत को बटने नहीं देंगे। ये देश, ये भारतमाता किसी एक की नहीं बल्कि सभी की है। इसमें विरोध को रखिए पर विद्रोह को मत रखिए। एक हो कर कहिए भारतमाता की जय न की अनेक हो कर।  

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

शिक्षण संस्थान खुद करें चिंतन

कभी कभी कुछ घटनाएँ हमें कई बडे़ मुद्दों पर सोंचने को मजबूर कर देती हैं। पर शायद हम उनको गंभीरता से नहीं लेते और उसके दूरगामी परिणाम आने वाली पीढ़ी को झेलने पड़ते हैं। ऐसी एक नहीं बल्कि कई घटनाएँ हाल ही में भारत में घटी हैं और लगातार घट रही हैं जिसको अलग अलग करकें देखें तो शायद हर घटना की वजहें अलग अलग हैं पर इन सब में एक बात समान है कि ये सभी घटनाएँ शिक्षण संस्थानों में घट रहीं हैं। इन घटनाओं में कुछ को मैं यहाँ बताना चाहूँगा। पहली दो घटनाएँ जिसका मैं खुद गवाह रहा वह लखनऊ विश्वविद्यालय में घटी। विश्वविद्यालय में नार्थ जोन की महिला अंतरविश्वविद्यालय हाॅकी प्रतियोगिता चल रही थी। जिसमें 30 जनवरी की दोपहर को कुछ लड़कियों के साथ वहां के छात्रों ने छेड़खानी की। जिसको एक अखबार के फोटोग्राफर नें अपने कैमरे में कैद कर लिया। इसकी निंदा हर तरफ हुई। होनी भी चाहिए क्योंकि सभ्य समाज में ऐसी घटनाओं के लिए कोई जगह नहीं। दूसरी घटना ठीक अगले दिन फिर घटी। इसबार की घटना को शायद किसी ने भी गौर नहीं किया पर मेरे लिए वो शर्मनाक घटना के समान ही थी। लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन चल रहा था समय यही कोई शाम 6 बजे के करीब का रहा होगा। तमाम महाविद्यालयों के छात्र छात्राओं ने बेहतरीन कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया। 7 बजे के करीब कार्यक्रम खत्म हुआ और वहां की पहली महिला प्रोक्टर डॉ. निशी पांडे ने सभी छात्रों को तो वहां से शांती पूर्ण तरीके से जाने को कहा परन्तु लड़कियों को यह कहते हुए अपनी जगह बैठे रहने को कहा कि उनके जाने का इंतजाम किया गया है। मुझे यह सुनकर थोडा अटपटा तो लगा पर मैं भी अतिथि दीर्घा से उठा और बाहर आ गया। चूँकि मैं किसी का इंतजार कर रहा था तो वहीं कार में बैठा रहा। अचानक से पुलिस की एक बड़ी फौज जिसका नेतृत्व पुलिस के एक अधिकारी कर रहे थे उनके घेरे में वहां पंडाल में मौजूद 200 से अधिक लड़कियों को उनके छात्रावास ले जाया जा रहा था। समय का विशेष ध्यान रखें शाम का 7 बजके 30 मिनट हो रहा था। यह देख मुझे शर्म आई कि क्या लखनऊ शहर अभी भी इतना असुरक्षित है ? जबकि इसी शहर ने देश में पहली वीमेन पॉवर हेल्पलाइन 1090 की शुरुआत कर महिलाओं की रक्षा के लिए गंभीरता दिखलाई थी। तो क्या वह सब मात्र एक दिखावा है ? खैर इसके बाद तीसरी घटना हैदराबाद विश्वविद्यालय की है जिसके बारे में शायद अब देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व जानता है। रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसकी लिखी चिट्ठी। जिसने देश में दलित की स्थिति पर फिर से गंभीरता से चिंतन करने के लिए मजबूर किया है। हालाँकि कुछ तथ्यों में यह भी आया कि वह दलित छात्र नहीं था। वो जो भी था पर उसके खड़े किये गए सवाल शायद ज्यादा जरुरी हैं और उसकी मौत पर हो रही राजनीति सीधे तौर पर दुखद है। चौथी घटना दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की है जहाँ कुछ छात्र छात्राओं ने पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए और अफज़ल गुरु को शहीद का दर्जा दिया। इन घटनाओं के साथ ही तमाम विश्वविद्यालयों से शोध छात्राओं के साथ शोषण की खबरें, लड़कियों के पहनावे, वर्चस्व की लड़ाई, फर्जी डिग्री, खूनी संघर्ष आदि जैसी घटनाएँ लगातार सुनने को मिलती रहती हैं। मेरा सवाल यहीं से शुरू होता है कि क्या वाकई यह कोई बड़ा बहस का मुद्दा नहीं है। उपरोक्त चार घटनाओं को जिनका मैंने जि़क्र किया अगर उन सभी पर गौर करें कि आखिर इसमें सही माएने में दोषी कौन है? भारत की राजनीति? विभिन्न क्षेत्रों से आये छात्र? विश्वविद्यालय प्रशासन? हमारी शिक्षण प्रणाली? या फिर स्मार्ट बन रहा देश? सवाल विश्वविद्यालय के शिक्षकों पर भी उठता है आखिर छात्रों से सीधे सरोकार इन्हीं का होता है। आखिर यह कौन सी शिक्षण व्यवस्था है जहाँ अभी भी हम उन समस्याओं से जूझ रहें हैं जो आज से 50 साल पहले थी। विश्वविद्यालयों को नकारात्मक राजनीति में शामिल होने देना कितना उचित है? क्या ऐसी व्यवस्था की ओर जोर देने की ज़रूरत नहीं कि वहां के प्रशासन को इतनी शक्ति प्राप्त हो कि वह संस्थान में सकारात्मक सोंच से सिर्फ शिक्षा पर ध्यान दे सकें। जिस जगह से हम पढ़ कर देश में एकता, सुरक्षा, समानता का पाठ दुनिया भर को पढ़ाते हैं वहीं लड़कियों को इस तरह पुलिस के घेरें में जाने के लिए मजबूर होना। एक छात्र की मौत पर दलित राजनीति का खेल खेलना और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर संविधान व्यवस्था को खुली चुनौती देना कहाँ तक न्यायोचित है। अभिव्यक्ति की आजादी की परिभाषा को संसद और न्यायालय को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है। इस बात पर भी चिंतन होना चाहिए कि छात्र हित के लिए बने तमाम छात्र संघठन कहीं वोट बैंक की राजनीति के लिए एक मोहरा मात्र तो नहीं हैं। संसद और न्यायालय को इस बात पर भी चिंतन करने की बहुत ज़रूरत है। खैर उम्मीद इस बात की कर सकते हैं कि विश्वविद्यालयों के तमाम संगठन बने हैं जिसमें छात्रों और शिक्षकों के अलग अलग हैं, जबतक संसद या न्यायालय कोई नियम नहीं बना देते तबतक देश के भविष्य की इस नीव को सुरक्षित और गुणवत्ता परक बनाए रखने के लिए इन संगठनों को एक साथ बैठ कर खुद के लिए कुछ नियम बनाने होंगे वरना परिणाम आप सभी समझ ही रहे हैं। आखिरकार इस देश की हर स्थिति के लिए जो भी जिम्मेदार रहा है या रहेगा वो आप के ही मार्गदर्शन से वहां तक पहुँच रहा है।


शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

कांग्रेस की आखरी उम्मीद

जब कुछ भी समझ नहीं आता और लगातार काम करते करते थक जाने पर अकसर हम कुछ दिन का आराम लेते हैं और नए सिरे से काम करने की भूमिका बनाते हैं। इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो अचरज सा हो। पर जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से कुछ दिनों की छुट्टी मांगी यह कह कर की वो पार्टी के बेहतरी के लिए आत्म-मंथन करना चाहते हैं। तब राजनीति के सभी जानकार और राजनेता अचरज में पड़ गए कि आखिर ऐसी भी कोई छुट्टी होती है?  पर जब परिस्थितियां असाधारण हों तो ऐसे अनोखे कदम को अस्वाभाविक नहीं माना जाएगा, इसीलिए शायद अप्रैल में होने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के अधिवेशन से पहले राहुल गांधी के अवकाश पर जाने के निर्णय को काफी दिलचस्पी से देखा जा रहा है। इसकी वजह भी है और शायद राहुल गाँधी को इसकी ज़रुरत भी। कांग्रेस की पिछले लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त हुई, उसके बाद राज्यों में उसका आधार खिसकने का क्रम जारी रहा और इस महीने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में तो वह एक भी सीट जीतने में नाकाम रही। इसके बाद पार्टी के अंदर से आवाज उठने लगी कि कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट है। अगर अभी भी गंभीरता से नहीं सोंचा गया तो कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट और भी गहराता जाएगा। कांग्रेस की फिलहाल जो दिक्कत है वो यह है कि नीति एवं कार्यक्रम के मामले में वह भटकाव की शिकार है। और सबसे बड़ा सवाल कि आखिर ऐसी क्या वजह रही जो राहुल की तमाम कोशिशों के बावजूद भी कांग्रेस जनता के दिल में अपनी जगह नहीं बना सकी। राजनीति में अगर आप को जनता के दिल में जगह बनानी है तो आपको जनता के सामने उसके हित के कार्यों का एक खाका तैयार करके रखना होगा। वो भी ऐसा नहीं कि जो यथार्थ में विश्वास करने योग्य न हो। सिर्फ सत्ता की चाह और जुनून ही काफी नहीं होता। इस राजनैतिक कला में अन्य पार्टी के नेता राहुल गांधी से कहीं ज्यादा काबिल दीखते हैं। अब समय इतना ही है कि कांग्रेस अगर अब भी राहुल गाँधी के नेतृत्व में आगे बढ़ना चाहती है तो राहुल गांधी को कोई न कोई ऐसा सूत्र तैयार करना होगा जो कांग्रेस की डूबती नांव को उबार सके। परन्तु यदि राहुल इसमें विफल होते हैं तो कांग्रेस को अपने नेतृत्व बदलाव में देरी नहीं करनी चाहिए।

आम जनता का बजट

अब इस बजट को संकटकाल का बजट कहिए या फिर देश की प्रगति का सकारात्मक बजट। जिस तरह से किराया न बढ़ाते हुए बीजेपी सरकार ने जनता को राहत देने कि बात की है। वहीं दूसरी तरफ मालभाडा बढ़ा कर महंगाई बढ़ने के संकेत भी दे दिए हैं। पूरे बजट को देखें बीजेपी सरकार ने टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने की बात की है। सुरक्षा को लेकर भी कडे कदम उठाये गए हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड का इस्तेमाल करना सराहनीय कदम माना जा सकता है। दो महीने की बजाये 4 महीने पहले टिकट आरक्षित कराया जा सकता है। पांच मिनट में सामान्य टिकट मिलेगा। पब्लिक पार्टनरशिप पर जोर। यह सभी कदम बेहतर दिखाई देते हैं। ऐसे में इसे बेकार बजट की श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता। विपक्ष इसको बेहतर नहीं मानती जैसा हर बार होता है। पर इस बार के बजट में कोई भी कमी नहीं निकाली जा सकी बस ये ज़रुर कहा गया कि बजट में सपने ज्यादा दिखाए गए हैं और यथार्थ में कुछ भी होना संभव नहीं दिखता। विरोध इस बात का भी किया जा रहा है कि आखिर क्या वजह है जो इतिहास में पहली बार बीजेपी सरकार ने कोई भी नई ट्रेन की घोषणा नहीं की है। ऐसे में सरकार पर सवाल उठ रहे। पर इस बात का ध्यान ज़रुर रखना चाहिए कि ट्रेन बढ़े या न बढ़े सुविधाएं ज़रुर बढाई जाएं। जिस प्रकार से सफाई को लेकर इस बार के बजट में जोर दिया गया है। साथ ही ई-फूडिंग की व्यवस्था, पीने का साफ पानी, बुजुर्गों और महिलाओं को लोवर बर्थ का कोटा आदि कई ऐसे कदम हैं जो बेहद ज़रुरी और अहम हैं। इनपर काम होना भी ज़रुरी है। अब बात सिर्फ इतने में ही नहीं सिमटनी चाहिए कि ये कार्य किये जायेंगे बल्कि इनका क्रियान्वयन भी हो इसका ध्यान देना मोदी जी को ज़रुरी है। हाल ही में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर चैतरफा घिरने के बाद ये ज़रुरी हो गया है कि जो भी वादे भारतीय जनता पार्टी अब कर रही है उस वह पूरा ज़रुर करे साथ ही कार्य दिखे भी। वरना जनता का भरोसा अगर उठा तो फिर उसे वापस लाने में बहुत दिक्कत होगी। बजट चुनावी हो या फिर परंपरागत, लाभ का केंद्र बिंदु आम जनता ही होनी चाहिए।