जिस देश ने भारत पर 200 साल तक राज किया हो। जिसने वो हर कदम उठाये जिसे आज भी सुन कर हमारा दिल सिहर उठता है। जिस वक्त हमारा देश गुलामीं की जद में था उस वक्त के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को अध नंगा फकीर कह कर मजाक उड़ाया हो। उसी देश में उस अध नन्गे इंसान को सलाम किया जाए। उसकी मूर्ति लगे। और यही नहीं महात्मा गांधी की मूर्ति उसी इंसान के साथ जिसने ऐसा मजाक किया हो। ये सपना भी लगता है और गर्व का समय भी। कुछ ऐसा ही हुआ ब्रिटेन के ऐतिहासिक पार्लियामेंट स्क्वेयर में जहां शनिवार महात्मा गांधी की मूर्ति का अनावरण किया गया। समारोह में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून, वित्त मंत्री अरुण जेटली, महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी और महानायक अमिताभ बच्चन भी शामिल हुए। कांस्य की इस मूर्ति को मशहूर शिल्पकार फिलिप जैक्सन ने तैयार किया है। महात्मा गांधी ऐसे विरले महापुरुष हैं, जिनकी भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका के बेलेवू में स्थित एस्फोर्ड पार्क प्लाजा, अस्ट्रेलिया के केनबरा में स्थित ग्लेब पार्क, चीन के बीजिंग स्थित शाओयेंग पार्क, और रूस के मास्को स्थित स्टेट फारेन लिटरेचर लाइब्रेरी समेत 70 से ज्यादा देशों में मूर्तियां लगी हुई हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड ने कहा कि यह प्रतिमा विश्व राजनीति के सर्वकालिक शिखर पुरुषों में से एक को दी गई शानदार श्रद्घांजलि है। उनकी ज्यादातर शिक्षाएं आज भी बेहद प्रासंगिक और भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी हैं। महात्मा गांधी की इस मूर्ति के कई मायने हैं। ये सिर्फ हमें विश्व में अपने नाम की और ज्ञान की महत्ता को ही नहीं दर्शाता बल्कि इससे हमें भी बहुत शिक्षा मिलती है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि आज पूरा विश्व हमारे देश के विचार से प्रभावित हो रहा है। क्या वाकई में हम विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। अगर ऐसा है तो इसके लिए हम क्या प्रयास कर रहे। सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने नेताओं के भाषण ही पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए हमे अपने उस मूल को भी पकड़ना होगा जिसके लिए आज भी पूरा विश्व भारत देश का आभार मानता आ रहा है। ब्रिटेन में लगी ये मूर्ति अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से कितनी सही है, यह भारत और ब्रिटेन के संबंधों पर कितना प्रभाव डालेगी। ये तय करना अभी जल्दबाजी होगा। पर इससे हम यह सीख जरूर लें कि कोई भी देश अगर विश्व स्तर पर अपने आप को स्थापित करता है तो वह उसका मूल है, उसका इतिहास है।
रविवार, 8 अप्रैल 2018
तीन साल- दर्द या मरहम
सरकारें आती हैं चली जाती हैं पर हम यहीं रहते हैं। देश के विकास की धारा में या तो हिस्सा बनकर या उसकी उम्मीद के लिए। पर इसका मुख्य कर्ता कौन है? सरकार। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार को आज तीन साल पुरे हुए। सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने में जुटी है और विपक्ष नाकामियां। पर इसका अर्थ क्या हुआ? क्या ये दिन भी वैलेंटाइन डे की तरह है कि जिसे अच्छा लगा वो तारीफ करे? जिसे नहीं वो बुराई। खैर ये राजनीति है हमे इसके लाभ और हानि से मतलब नहीं। हमे तो ये जानना है कि क्या 2012 में जो फैसला हमने लिया था वह सही था ? क्या वाकई में हमें जो सपने सपा सरकार ने दिखाए थे, जो संकल्प हमारे सामने लिए थे वो पूरे कर दिए हैं। कुछ पहलुओं पर देखें तो शायद कोशिश की गई है। पर कई ऐसे भी पहलू हैं जहां हमें वाकई धोखा सा लगता है। सरकार की तमाम ऐसी योजनाएं जो शायद सपा का पूर्ण बहुमत से सरकार में आने के मुख्य बिंदु थे उन्हें ही सरकार ने बंद कर दिया। उदाहरण के लिए बेरोजगारी भत्ता, लैपटॉप, टेबलेट, कन्या विद्याधन, आदि। मेट्रो, एक्सप्रेस-वे जैसी योजनाएं जनता को लुभा भी रही हैं। क्या वाकई में सिर्फ इसी के लिए हम सरकार चुनते हैं? शायद नहीं। हमारी ज़रुरत सुरक्षा, बिजली, पानी, रोजगार, जैसी छोटी छोटी चीज़ें हैं जिन्हें देने में अभी भी प्रदेश सरकार पूरी तरह से जनता के भरोसे पर खरी नहीं उतर सकी है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को अपने बेटे पर जितना भरोसा है उतना ही भरोसा प्रदेश की जनता ने भी किया था। पर परिवारवाद से उठ कर शायद इस बार भी सपा नहीं सोंच सकी है। 2017 का चुनाव अब बहुत दूर नहीं है और देश के सबसे बड़े प्रदेश की फिलहाल जो स्थिति बनी हुई है ऐसे में सपा को आत्म मंथन करने की ज़रुरत है। कहीं ऐसा न हो कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा को अप्रत्याशित नतीजे देखने को मिलें। आप के बड़े बड़े अच्छे कार्यों पर मूल रूप की खामियां इस कदर भारी पड़ रही हैं जो आप की मुश्किलें बढ़ा देने के लिए काफी हैं। जैसे कि अपराध, परिवारवाद, कोई भी ठोस कदम न उठाना। यादव वाद भी इसका मुख्य कारण है। मुलायम सिंह यादव आप देश के बड़े ही माहिर राजनेताओं में से हैं। ऐसे में आप की सरकार का लगातार गिर रहा ग्राफ आप कि राजनीति पर भी सवाल खड़े कर रही है। जनता को जो भी दर्द मिला हो या उसे मरहम मिला हो। इसका फैसला तो 2017 में होगा। पर आप ज़रुर इसे ध्यान रखें कि अगर अभी नहीं चेते तो जनता फिर कभी शायद ध्यान न दे।
आप का मैं में परिवर्तन
आम आदमी पार्टी यानी कि आप। इसकी परिभाषा जो अरविन्द केजरीवाल ने पार्टी बनाते वक्त दी थी वो कुछ इस तरह थी कि यह आम जनता की पार्टी है। भारत देश के हर इंसान की पार्टी है। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों के इस विचार पर समीर अनजान का लिखा और हिमेश रेशमिया का गाया वो गाना भी बिलकुल फिर बैठता है “तुम और मैं गर हम हो जाते”। पर हाल ही में पार्टी की अन्तह् कलह को देखते हुए पार्टी की सोंच कुछ इस तरह से जान पड़ती है कि चलो बस हो चूका मिलना, न तुम खाली न हम खाली। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, अंजलि दमानिया, मयंक गांधी के बाद अब पार्टी की बिहार यूनिट के प्रमुख बसंत कुमार चैधरी ने अपने राष्ट्रीय नेतृत्व पर व्यक्तिवाद और स्वार्थ की संस्कृति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। चैधरी ने कहा, ‘आज पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र की जगह स्वार्थी लोगों ने ले ली है। पार्टी अपने अंत की तरफ तेजी से बढ़ रही है। अब बातचीत का केंद्र ताकतवर नेतृत्व बन गया है। भ्रष्टाचार से दूर रहने और आंतरिक लोकतंत्र जैसी बातें अब अर्थहीन हो गई हैं। पार्टी की तरफ से मोर्चा संभाले वाक्पटुता के धनी कुमार विश्वास का कहना है कि ये लोग पार्टी को बुरी स्थिति में दिखाने के लिए साजिश करते हैं। कुमार विश्वास ने आप के पूर्व विधायक राजेश गर्ग पर भी आरोप लगाए हैं। विश्वास के अनुसार राजेश गर्ग ने ही इस ऑडियो स्टिंग को मीडिया में रिलीज किया है। उसने ही यह टेप एक पत्रकार को उपलब्ध कराया था। उन्होंने इस बात पर विश्वास जताते हुए कहा कि वे लंबे समय से ऐसे लोगों के बीच काम कर रहे हैं उन्हें ऐसे लोगों से निपटना और ऐसी स्थितियों से उबरना आता है। ये तो बयान हैं। खैर अगर हम पार्टी के बनते वक्त की बात करें तो योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से विचार विमर्श के बिना कभी भी अरविन्द केजरीवाल ने कोई भी कदम नहीं उठाया था। जिस सोंच और संकल्प के बीच इस पार्टी ने जनता का विश्वास जीता है क्या वह इस अंतर विरोध के बाद बचा रहेगा। क्या पार्टी वाकई में कुछ खास लोगों के ही मध्य सिमट के रह गई है। कुमार विश्वास का यह कहना कि अरविन्द केजरीवाल जब बीमार होते हैं तभी विरोध उत्पन्न होता है। ये कहीं इस बात का इशारा तो नहीं कि अरविन्द केजरीवाल ही एक मात्र माध्यम हैं जो इन सब को एक साथ बांधे हुए हैं। वरना इस दल में कोई भी लोकतंत्र या एकमत विचार का समर्थक नहीं है।
विरोध, बंद नहीं साथ खोलने का काम कब
पुलिस गलत, अधिवक्ता गलत, राजनीति गलत, गुस्सा इतना कि देश पूरा पटरी से उतर सा गया है। पुलिस और वकील की एक लड़ाई। जिसमें शायद उन दोनों के पडोसी का भी कोई मतलब न रहा होगा। पर आज पूरा देश इसका दंश झेल रहा। वकील साहब न जाने कितने ऐसे बेगुनाह होंगे जिसे जेल से सिर्फ इस लिए नहीं रिहा किया जा रहा है क्योंकि आप काम नहीं कर रहे। आप का गुस्सा है कि मेरे एक अधिवक्ता भाई को गोली मारी गई है और वो मर गया है। बेशक उस पुलिस वाले को सजा मिलनी चाहिए। आखिर वो रिवाल्वर लेकर कचहरी में आया कैसे। और फिर झगडा हुआ भी आप से तो गोली मारी वो भी गलत। आप तो कानून के संरक्षक हैं। आप के हांथ में सब कुछ है लटकवा दीजिये उसे फांसी पर। पर इस विरोध को रोकिये। क्योंकि इस विरोध से न जाने कितने ऐसे लोग जीते जी मर रहे हैं जिनकी आखरी आस ही आप कि कचहरी है। ये सवाल तो था वकीलों से अब सवाल प्रशासन से है। आप किस प्रकार का रवैया अपनाना चाहते हैं वकीलों के विरुद्ध। रात में गैर कानूनी तरीके से तहसील को हस्तानांतरित करने का काम करते हैं। विरोध होता है तो लाठियां चलाते हैं। फिर विरोध होता है फिर लाठियां चलती हैं। सरकार जागती है और प्रशासन के ज़िम्मेदारों को तलब करती है। बस सरकार का भी काम पूरा हो जाता है। आखिर कब तक इस तरह आप सभी आम जनता को ढाल बना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहेंगे। आखिर ये विरोध, ये आक्रोश किसके लिए है? बार काउंसिल ऑफ इंडिया का भी कार्य बहिष्कार करना कितना सही और कितना गलत है ये कोई और नहीं बल्कि अधिवक्ता भाई खुद ही तय करें। आखिर आप भी देश के एक स्तम्भ का अंग हैं। सवाल आप से भी बनते हैं। विरोध कब तक होगा ? एक बार जरा साथ में विरोध करने नहीं बल्कि विरोध को रोकने के लिए काम करें। ये देश आप का है। ये विरोध, ये बंद आपके अहम को तो शांत कर सकता है। पर क्या देश के अहम को बरकरार रख सकता है? क्या हमारे देश में विरोध को ही विकास का रास्ता समझा जाता है? एक बार विरोध नहीं, बंद नहीं साथ में देश के विकास और सुरक्षा के मार्गों को खोलने का काम करें।
मोदी की सरकार का तेवर नज़र नहीं आता
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की रिहाई पर पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह और फिर बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बयान दिया। लेकिन विपक्ष उनके बयान से संतुष्ट नहीं हुआ। दोनों ही नेताओं ने कहा कि उनके स्वर भी सदन के सदस्यों के आक्रोश के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने सदन को बताया कि जम्मू कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वो बिना केंद्र सरकार के मशविरे से हो रहा है। मोदी ने कहा, आक्रोश दल का नहीं, यह आक्रोश उस तरफ की बेंचों या इस तरफ की बेंचों का भी नहीं बल्कि पूरे देश का है। हम एक स्वर से अलगाववाद को समर्थन करने वालों के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करते हैं। इससे पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोक सभा को बताया कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के गृह विभाग से मसर्रत आलम बट की रिहाई के बारे में स्पष्टीकरण माँगा है। बट के खिलाफ 1995 से कुल 27 मामले दर्ज हैं जिनमें देश द्रोह के भी मामले हैं। कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि अगर भाजपा की सहमति के बिना जम्मू-कश्मीर सरकार ऐसे कदम उठा रही है तो भाजपा पीडीपी सरकार से अलग क्यों नहीं हो जाती ? मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न होने का श्रेय पाकिस्तान और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत अलगाववादियों को भी दिया, पीडीपी के विधायकों ने संसद हमला कांड में फांसी पर चढ़ाए गए आतंकवादी मोहम्मद अफजल के अवशेष मांगे और उसके बाद आलम की रिहाई हुई। इन पुरे हालातों को देख कर केंद्र सरकार का घिरना तय ही था। नरेन्द्र मोदी ने जो भी सदन में कहा वो सुनने में तो बहुत ही अच्छा लग सकता है पर शायद समस्या का यह निदान नहीं है। जिस जम्मू कश्मीर को हम देश की जन्नत कहते हैं वहां इस तरह की घटनाएं देश के लिए कभी भी सही नहीं हो सकती। रही बात भाजपा कि तो यह कहना किसी भी तरीके से ठीक नहीं जान पड़ता कि यह पूरा निर्णय सिर्फ और सिर्फ जम्मू कश्मीर की बीजेपी इकाई का है। नरेन्द्र मोदी जी आप को इस बात का भी ध्यान रखना होगा की जम्मू कश्मीर सरकार में बने रहने की आप की महत्वाकांक्षा कहीं पुरे देश में आप को नुक्सान न पहुंचा दे। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि जम्मू-कश्मीर सरकार बचाए रखने के लिए भाजपा कितनी नरमी बरतेगी? भाजपा के बयान और उनके स्पष्टीकरण में कहीं भी नरेन्द्र मोदी की सरकार का तेवर नज़र नहीं आता। जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र का सपना आप की सत्ता की चाहत कहीं सपना ही न बना रहने दे।
विकल्प हमेशा ही जनता के हाँथ में है
भारतीय राजनीति में उसे बहुत पसंद किया जाता है जो बेहतर वक्ता होता है। जो हाजिर जवाबी होता है। जिसे हर सवाल का बेहतर तरीके से जवाब देना आता है। फिर वो चाहे सदन में पूंछा गया हो या मीडिया द्वारा। उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री को राजनीति में कच्चा खिलाडी माना जाता रहा है। लेकिन कुछ महीनों में देखें तो अखिलेश यादव जिस तरह से सदन में जवाब देते दिखते हैं। मीडिया को जवाब देते दिखते हैं वो कहीं न कहीं राजनीति के अच्छे लक्षण ही जान पड़ते हैं। मंगलवार को सदन में अखिलेश यादव ने राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा जो कि सर्वसम्महति से पास हो गया। इस बीच सीएम ने विपक्षियों की जमकर चुटकी भी ली। सीएम सदन में आए और अपना धन्यवाद प्रस्ताव पढ़ा। उन्होंने अपने हाजिर जवाबी से यह भी साबित कर दिया कि वे पक्के राजनीतिक व्यक्ति बन गए हैं। मंगलवार को सदन में सीएम अखिलेश ने सरकार की योजनाओं का जमकर बखान किया और बीच-बीच में विपक्षियों पर हमले भी किए। बातों-बातों में ही सीएम ने नेता प्रतिपक्ष को सपा में शामिल होने का न्योता भी दे दिया। धन्यवाद प्रस्ताव के शुरुआत में ही सीम अखिलेश ने चुटकी लेते हुए कहा कि सुना है नेता प्रतिपक्ष कह रहे हैं कि सपा सरकार की योजनाएं झुनझुना है। वहीं, एक दल कहता है कि ये योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही लागू हंै। सीएम ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष सपा सरकार के झुनझुने की तारीफ कर चुके हैं। सीएम ने स्वामी प्रसाद मौर्या पर चुटकी लेते हुए कहा कि जब एक्सप्रेस-वे बन जाएगा तब आपको साथ घुमाने जरूर ले जाएंगे। सीएम अखिलेश यादव ने मायावती पर निशाना साधते हुए कहा कि जो हाथी पुरानी सरकार ने बनवाए थे, वह खड़े ही रह गए हैं। सदन में अखिलेश यादव ने कहा कि एक दल कह रहा था कि 24 घंटे बिजली देंगे, लेकिन यह नहीं बताया कि 24 घंटे बिजली देंगे कैसे? सीएम ने कहा कि 24 घंटे बिजली आपूर्ति के लिए सपा सरकार लगातार काम कर रही है। अखिलेश यादव के इस तरह का बयान दिया जाना उनका राजनीति के लिए परिपक्व होना दर्शाता है। पर इस बात का ध्यान रखना होगा की आप अपनी वाक्पटुता से भले ही राजनीति के लिए तैयार हो गए हैं पर अब जनता बातों से मानने वाली नहीं है। काम करके दिखाइए जनता आपका साथ देगी। वरना विकल्प हमेशा ही जनता के हाँथ में रहता है।
विरोध कितना सही
अक्सर आप पर सवाल उठे हैं। आप की एकता से सभी डरते भी हैं। इसकी मिसाल भी देते हैं। अच्छी बात है की आप में इतनी एकता है। कहा भी जाता है कि एकता में ही शक्ति है। पर क्या यह शक्ति आप की सही दिशा में लग रही है ? क्या वाकई में आप इस शक्ति के माध्यम से देश में एक बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में आप के द्वारा तमाम प्रकार के विरोध प्रदर्शन किये गए। जिसका खामियाजा उस इंसान ने भरा हो या नहीं जिसका आप विरोध कर रहे थे। पर आम जनता को उसने काफी हद तक बेहाल कर दिया। किसी की जान गई और किसी ने पहली सांस भी उसी जाम में ली। इस बार फिर से आप विरोध कर रहे। तहसील का ट्रान्सफर होना सही है या नहीं ये तो वही बता सकता है जिसका उससे अक्सर वास्ता पड़ता रहता है। ये भी सही है कि उसकी दूरी आप को भी खल रही है। पर जिस तरह का आप का विरोध है। जरा सोंचिये की इसकी वजह से न्यायालय में आने वाले फरियादियों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा। आप की मांगे जायज़ हो सकती हैं पर उसका विरोध सीधे आम जनता को कष्ट दे कर हो कहां तक सही है ये। आप खुद तय करें। पुलिस द्वारा आप पर हुए लाठीचार्ज को कोई भी सही नहीं मानता पर क्यों नहीं ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे आप के बुद्धजीवी होने के पद पर सवाल न खड़ा किया जाए। जिस तरह से आप की छवि पर उंगलियां उठने लगी हैं। ये आज तो नहीं पर आने वाली आप की ही नई पौध के लिए कितनी घातक साबित होगी इसका अनुमान आप खुद हि लगा सकते हैं। ऐसा न हो कि लोग अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए आप का साथ लेने से भी कतराने लगें। इसके लिए बेहतर होगा कि समय रहते ही आप गंभीरता से इस पर विचार करें और अपने विरोध के तरीके को थोडा सा बदलें ताकि आप की मांगें भी पूरी हो सकें और आम जनता को भी कोई दिक्कत न हो।
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