चूँकि हम संवैधानिक परिपेछ में भारत में चुनाव सुधार की बात कर रहे है तो उपरोक्त दोनों पहलूवो में दूसरा पहलु आज हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है। क्यों की चुनाव कराने में चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अहम होती है।
90 के दशक में देखे तो चुनाव आयोग की कार्यशैली में जो क्रान्तिकारी परिवर्तन हमे देखने को मिला वह 12 दिसम्बर 1990 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी0 एन0 शेषन के समय में देखने को मिला। जिसके सकारात्मक परिणाम हमे वर्तमान के चुनावों में देखने को मिले है। परन्तु अब अगर हम इसके दुसरे पहलु को देखे तो हमे ये एक विडंबना ही दिखती है। की जनतंत्र में जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए प्रचार के माध्यमों से प्रोत्साहित करना पड़ता है। चुनाव आयोग मत प्रतिशत को बढाने के लिए साथ ही जनता की भागीदारी को बढाने के लिए संचार माध्यमो के हर तरह से प्रयोग कर रहा है। तथा ऐसा करके सफल होने को वो अपनी उपलब्धी मान रहा है। चुनाव आयोग के लिए तो ये जरूर उपलब्धि है परन्तु क्या इसे लोक तंत्र की उपलब्धी मना जाना चाहिए? सवाल ये है?
इस सवाल के कारण क्या है। उन पहलूवो पर ध्यान दे तो कुछ बाते सामने आती है। जैसे की सही उम्मीदवारों का चयन ना होना, जनता को हर चुनाव में अपने आप को ढगा सा महसूस करना, पार्टियों में भ्रष्टत्तंत्र होना, जनप्रतिनिधियों की जनता से दुरी होना, भ्रष्टाचार, अपराध, जातिवाद, कालाधन आदि। ये वो कारण है जो वर्तमान समय में पैदा नहीं हुए ना ही इन विषयो से कोई अनिभिज्ञ है। परन्तु समस्या ये है की इन कारणों को दूर करने के लिए अभी तक जितने भी कदम उठाए गए वो असफल तो नहीं परन्तु सफलता के अंतिम पायदान तक भी नहीं पहुँच पाए हंै। ऐसा भी नहीं की प्रयास नहीं किया गया परन्तु ये जरूर है की प्रयास पूरा नहीं हुआ।
अगर हम देखे तो समय समय पर चुनाव सुधार को लेकर तमाम तरह की चर्चाऐं एवम रपट सुनाने व देखने को मिलती रही है। तमाम सामाजिक संस्थानों ने भी चुनाव सुधार को लेकर आवाज बुलंद की है।
चुनाव सुधार के लिए चुनाव आयोग की सिफारिशे वर्त्मान में अमल में लाई दिखती है परन्तु सब नहीं। चुनाव में नकारात्मक मतदान की मांग. वापस बुलाने का अधिकार आदि को लेकर तमाम सामाजिक संस्थायें एक मंच पर आती दिखी और जनता भी कही ना कही उन्ही के समर्थन में दिखी।
1961 में बने चुनाव नियम का आचरण की धारा 49 ’ओ’ को लेकर तमाम मतदाता जागरूक दिखे। ऐसे में कही ना कही संसद पर यह दबाव बनता दिख रहा है की अब इसकी नितांत आवश्यकता है।
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