जयपुर से दिल्ली तक का सफर बस से तय करते वक्त रास्ते में एक दीवार पे पढने को मिला की एक संस्था ने बड़े बड़े अक्षरों में नीले रंग से दीवार लेखन कराया था की संस्था सदस्य बनिए...देश भक्त बनिए... पढने के बाद एकदम से नजर बस के बगल से गुजर रही एक ट्रक पर पड़ी जिसके पीछे लिखा था जय हिंद... और उसके ऊपर सुंदर से दो तिरंगे बने थे। फिर एक और ट्रक निकला उसमे भी लगभग वैसे ही कुछ देखने को मिला। फिर दिमाग पर थोडा जोर डाला तो दिमाग की घंटी बज उठी और एक विचार दिमाग की सी डी से निकला जिसमे अचानक बचपन से लेकर इस उमर तक की एक फिल्म दिखी, और विचार आया की लगभग हर ट्रक में २ तिरंगे और जय हिंद जय भारत जैसे शब्द पढने को मिल जाते है। मगर ऐसा क्यों? क्या देश भक्ति यही है या ये कोई देश भक्ति का अड्डा है? वो संस्था जो अब देश भक्त बनाने की बात करती है, या ये ट्रक जो देश भक्त होने का अक्सर अहसास कराने की कोशिश करते है, क्या देश भक्ति ऐसे ही आती है? तो उन देश भक्तो की गाथाये जो हम पढते आ रहे है। उनको भी देश भक्त किसी संस्था ने या किसी ट्रक पर लिखे इस तरह के शब्दों ने बनाया था। इतना सोंचते ही तमाम तरह की बाते दिमाग में आ गई और मै सोंचने लगा की अगर वाकई ऐसा है तो वो संसद किस काम की जहा से देश भक्ति का अहसास ना महसूस हो। उन तमाम प्रतीक स्थलों का क्या जहा से देश भक्ति का जोश रगों में ना भरे। उन नेताओ का क्या जिन्हें देख कर देश भक्त को साक्षात् देखने का सौभाग्य ना महसूस हो। क्या वाकई आज देश भक्ति के कुछ अड्डे बन गए है? या यु कहू की कुछ देश भक्ति के ठेकेदारों ने जन्म ले लिया हो जिन्हें हर साल केंद्र सरकार टेंडर निकाल कर देश भक्त बनाने का काम सौपती हो। पर वो भी भ्रस्टाचार की मुखाग्नि में जल कर स्वाहा हो चुकी हो। सवालो ने ऐसा घेरा की फिर वाकई सोंचना पड़ा और ये अहसास हुआ की शायद ये सवाल खड़े होना लाजमी है। जिस देश में नेता बनने के लिए आप को घर की नालायक औलाद बनना पड़े, कोई बच्चा ये कभी ना कहे की मै बड़ा होकर नेता बनूँगा, और अगर कहे तो लोग उसे बिगड़ा हुआ माने, जिस देश की संसद आजादी के इतने साल बीतने के बाद भी गरीबी और अमीरी के मापने का एक निर्धारित मानक ना तय कर पाई हो। जिस देश में पुल पर सो रहा इंसान खाना ना मिल पाने के चलते दम तोड दे और इसकी खबर शायद अखबारों के लिए लो प्रोफाइल हो। वहा ऐसा हो सकता है। जिस देश में सरकारी आंकड़े कहते हो की देश की ६१ प्रतिशत जनसँख्या गरीब है। और विश्व का हर तीसरा अमीर भारतीय है। और इसे कोई चिंता का विषय ना समझे, वहा ऐसा हो सकता है। ये विषय सिर्फ और सिर्फ देश के राजनेताओं को ही नहीं सोंचना है बल्कि इसके प्रति हमारी भी जि़म्मेदारी बड़ी है।
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