शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

अध्यादेश का अंधापन

बीजेपी सरकार का आम बजट सदन में पेश होना है। मगर सदन इतनी आसानी से चल सकेगी यह थोडा मुश्किल दिख रहा। सदन में विपक्ष का विरोध और सड़क पर अन्ना का विरोध चल रहा। बीजेपी सरकार को इसे संभालना इतना आसान नहीं होगा। इसका मुख्य कारण है भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जो कि महज दो महीने पहले ही बीजेपी सरकार ने संसोधित कर लाया है। इससे पहले ये अध्यादेश 121 साल बाद बदल कर 2013 में कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया था जिसमें ज़मीन अधिग्रहण का प्रावधान बहुत ही जटिल कर दिया गया था साथ ही किसानों को दिए जा रहे मुआवजे की रकम भी बहुत बढ़ा दी गई थी। जिसका स्वागत सभी ने किया था। परन्तु बीजेपी सरकार द्वारा 2013 के अध्यादेश को संशोधित कर फिर से दिसम्बर 2014 में लाया गया। जिसमें भूमि अधिग्रहण के प्रावधान को जटिलताओं से हटाकर सरल यह कह कर किया गया कि देश की विकास गति को तेज़ करना है तो यह करना आवश्यक है। अगर हम किसानों की माने तो उनका विरोध इस बात का है कि सरकार भूमि अधिग्रहित न करे बल्कि किसानों से लीज पर ले तो न सरकार का नुक्सान है और न ही किसानों का।। अब मंगलवार को सदन में इसको लेकर बीजेपी ने बहस कर संसोधन करने की बात कही पर विपक्ष इसके पक्ष में ही नहीं है। उधर अन्ना के धरने को जंतर मंतर पर भी तमाम राजनितिक पार्टियों का समर्थन मिल रहा। इस पूरे प्रकरण में राजनितिक दल हो, अन्ना का अनशन हो या मीडिया हो। कोई भी इस कानून के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुवों पर चर्चा कम करके इसे एकतरफा विरोधी स्वरुप दिखा कर प्रस्तुत कर रहे। अगर हम इस पुरे कानून पर मोटा मोटा भी नज़र डालें तो इसमें इतनी पेचीदियां भी नहीं जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता। विरोध किसानों का अपनी जगह ठीक है पर इस पर राजनीति कहां तक सही है ? अगर सही मायनों में देखा जाए तो देश की विकास गति को बढाने के लिए जमीन की आवश्यकता है। पर अधिग्रहण ही एक मात्र रास्ता नहीं क्योंकि अधिकतर बार देखा गया है कि किसानों से ज़मीने तो विकास के लिए सरकार ले लेती है पर विभिन्न कारणों से अक्सर उस पर कोई कार्य नहीं होता और वो जमीन बेकार पड़ी रह जाती है। ऐसे में वो जमीन एक तय समय के बाद किसान को वापस करदी जाती थी। परन्तु बीजेपी सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश में किसान को वापस करने के नियम को खत्म कर दिया है। उसके अनुसार अगर कोई भी कंपनी विकास ज़मीन पर कोई कार्य नहीं कर पाती तो वह ज़मीन सरकार के पास चली जाएगी। दोनों पक्षों को देखें तो दोनों ही कई जगह सही और कई जगह गलत दिख रहे। ऐसे में ज़रुरत हंगामे की नहीं बल्कि आपस में बैठ कर कमियों को खत्म करने की है।  

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